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हार की जीत -A motivational story
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रमेश अपने घर में सबसे छोटा था लेकिन शैतान इतना था कि घर के सभी लोग उससे परेशान रहते थे। उसके मां-बाप भी बहुत ही ज्यादा परेशान रहते थे। ऐसा कोई दिन नहीं होता जिस दिन उसकी कोई शिकायत ना आती। रमेश की उम्र अभी सिर्फ 15 साल थी। लेकिन लड़कपन और शैतानी 5 साल के बच्चों जैसी थी। 1 दिन उसके पापा महेश ने उसको समझाया, बेटा जिंदगी में कुछ करने के लिए थोड़ा शांत रहना भी जरूरी होता है। लेकिन रमेश के समझ में कुछ नहीं आ रहा था। वह अपनी उन्हें आदतों में मशगूल था।

उसके मम्मी पापा ने उसे कई बार समझाया कि अपनी शैतानियां को कम कर दो। लेकिन रमेश पर कोई भी फर्क नहीं पड़ता। समय बीतता गया और रमेश बड़ा होता गया। जब वह हाई स्कूल की परीक्षा में बैठा तो उसे प्रश्नों के उत्तर की जगह आसमान के तारे नजर आने लगे। किसी तरह उसने परीक्षा दी लेकिन परिणाम तो उसे पहले से ही पता था। आखिर वही हुआ जो नहीं होना था। रमेश हाई स्कूल में ही फेल हो गया.

उसके मम्मी पापा ने अपने पास बुलाकर उसे प्यार से समझाया लेकिन रमेश के समझ में कुछ नहीं आ रहा था। इस बार भी वह हाई स्कूल की परीक्षा में फेल हो गया। उसके दोस्त उससे काफी आगे निकल गए थे। एक दिन, रात में उसने सोचा कि अगर मैं इसी तरह अपनी आदतों को बनाए रखूंगा तो भविष्य में मेरा क्या होगा। उसने इरादे मजबूत किए और जुट गया मेहनत करने में। इस बार जब उसने परीक्षा दी तो वह हाई स्कूल में स्कूल में टॉप कर गया। चारों तरफ से उसके लिए बधाइयां आ रहीं थीं। लोग उसके घर आ रहे थे बधाइयां दे रहे थे। उसके मम्मी पापा मोहल्ले में मिठाइयां बांट रहे थे। उसे उस दिन इतनी खुशी मिली जिसका बयान करना भी मुश्किल था।

रमेश जब स्नातक कर रहा था। उस समय उसके मम्मी और पापा की एक दुर्घटना में मौत हो गई। वह अकेला हो गया। वह नहीं समझ पा रहा था कि अब आगे क्या करेगा। वह पूरी तरह से भटक गया और इसका परिणाम आया कि वह स्नातक की परीक्षा में फेल हो गया। लेकिन उसे अपनी मम्मी बात पापा की बातों की याद आई कि अगर इरादे बुलंद हो तो दुनिया की कोई भी ताकत रोक नहीं पाती है। फिर उसने कड़ी मेहनत करनी शुरू कर दी और स्नातक की परीक्षा अच्छे अंको से पास हो गया।

उसके सामने पढ़ाई करने में बहुत बड़ी समस्या आ रही थी। उसके मम्मी पापा नहीं थे इसलिए पैसों का प्रबंध करना उसके लिए बहुत ही मुश्किल था। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी किसी तरह रमेश ने परास्नातक की भी परीक्षा पास कर ली। अब उसे जिंदगी में कुछ करने का समय था। वह अपने मम्मी पापा की बातों को याद करता कि अगर इरादे बुलंद हो तो दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती। यही सोच कर उसने फिर आगे कदम बढ़ाया। तैयारियों में जुट गया और उसकी एक क्लर्क के पद पर नौकरी लग गई। रमेश इससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं था। उसे अपने मम्मी पापा की बातें कचोट रही थी कि अगर कोई रोक नहीं सकता तो मैं कुछ भी कर सकता हूं।

आखिर उसने सिविल सर्विसेज में आवेदन किया। तीन बार रमेश असफल हुआ लेकिन उसके ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ा उसे पता था कि जिसके इरादे बुलंद होते हैं उसे दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं पाती। इसलिए वह मेहनत करता ही रहा और चौथी बार उसकी मेहनत रंग लाई। सिविल सर्विसेज की परीक्षा में उसकी चौथी रैंक आई।

वह एक अधिकारी बन गया था लेकिन इसके बाद भी उसकी इच्छाएं अभी खत्म नहीं हुई थी। वह रुकने का नाम नहीं ले रहा था क्योंकि वह जानता था कि जिनके इरादों में दम है उन्हें कोई नहीं रोक सकता। इसलिए उसने और भी कड़ी मेहनत करनी शुरू कर दी। वह अपने काम में बहुत ही इमानदारी से लगा रहता। गरीबों की मदद करता। हर समय अपने मम्मी पापा की बातों को सोचता। आखिरकार एक दिन ऐसा भी आया कि उसे एक बहुत बड़ी कंपनी से ऑफर आया। जिसका उसे CEO बनाया गया।

इसके बाद तो रमेश ने पीछे मुड़कर नहीं देखा वह जिस पर भी हाथ रख देता उसे पा लेता क्योंकि उसके इरादे इतने मजबूत हो चुके थे। उसके अन्दर इतना साहस पैदा हो चुका था कि उसे बड़ा से बड़ा काम छोटा दिखाई देता था। वह हर क्षेत्र में सफल ही होता गया। रमेश सिर्फ अपने मां बाप की एक बात को अपने दिमाग में रखकर आज इतना बड़ा आदमी बन चुका था कि उसके गांव के लोग उसे देख कर विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे। इसके बाद रमेश ने जो भी चाहा वह पाया क्योंकि उसके इरादे बुलंद थे। रमेश के दो बच्चे थे और दोनों ही उसी की तरह नटखट थे। उन्हें जब वह देखता तो धीरे से मुस्कुरा देता। वह समझ चूका था कि हमारा आने वाला कल भी हमारा ही होने वाला है।

जिस भी व्यक्ति के इरादे बुलंद होते हैं। उसे दुनिया की कोई ताकत वास्तव में रोक नहीं पाती है। एक कहावत है कि अगर मान लिया तो हार होगी और ठान लिया तो जीत होगी।

दीपक मेहता, राजस्थान 

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