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Udham Singh एक ऐसा आजादी का दीवाना, जिसने लंदन में जाकर अंग्रेज अधिकारी को मौत के घाट उतारा
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हमारा देश वर्षों तक अंग्रेजों के आधीन रहा और हम लोग अंग्रेजों के गुलाम बनकर जीते रहे। अंग्रेजों ने भारत वासियों पर इतने ज्यादा जुल्म किए जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। यह तो सब जानते हैं कि जब जुल्म हद से गुजर जाते हैं। तब कुछ ना कुछ ऐसा होता है की जुल्मी को सजा मिलती ही है।

ऐसा ही हमारे देश की आजादी में हुआ। हमारे देश के कई नौजवानों ने अपनी जान की आहुति दे दी। कई अंग्रेजों को दिनदहाड़े गोलियों से भूना। अंग्रेजों के भी हौसले पूरी तरह से पस्त हो गए। इतना ही नहीं हमारे ऐसे क्रांतिकारी भी हुए जिन्होंने भारत में मौका नहीं मिला तो लंदन में जाकर के अंग्रेजों को गोलियों से भूना।

हमारे देश में कुछ क्रांतिकारी ऐसे भी हुए जिनको इतिहास के पन्नों में दबा दिया गया। लेकिन उनके द्वारा किए गए कामों को भुलाया नहीं जा सकता। ऐसे ही एक क्रांतिकारी थे Udham Singh। Udham Singh ने जलियांवाला बाग कांड के समय पंजाब के गवर्नर जनरल रहे माइकल ओ डायर को लंदन में जाकर गोली मारी थी।

Udham Singh का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में हुआ था। 1901 में उधम सिंह की माता और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया था। इस घटना के बाद उधम सिंह को अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में रहना पड़ा। उधम सिंह के बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्ता सिंह था। जिन्हें अनाथालय में उधम सिंह और साधु सिंह के रूप में नए नाम दिए गए थे।

कई इतिहासकारों का मानना है उधम सिंह देश में सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे। इसके चलते ही उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया था। जो भारत के 3 प्रमुख धर्मों का प्रतीक है। अनाथालय में किसी तरह से उधम सिंह की जिंदगी चल रही थी कि 1917 में उनके बड़े भाई का देहांत हो गया। अब वह पूरी तरह से अनाथ हो गए।

1919 में उन्होंने अनाथालय को ही छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर देश की आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए। Udham Singh अनाथ होने के बावजूद भी विचलित नहीं हुए थे। उनके अंदर बहुत ही जोश था। वह अपने देश के खातिर खुद को कुर्बान तक करना चाहते थे। जलियांवाला कांड में जब सैकड़ों बेक़सूर लोगों को अंग्रेजों ने गोलियों से भून दिया। इस बात से क्रोधित होकर Udham Singh ने प्रतिज्ञा ले डाली। उन्होंने कहा कि मैं जिस अंग्रेज डायने हमारे सैकड़ों भाई -बहनों को मौत के घाट उतारा है। उसे जब तक मौत के घाट नहीं उतार दूंगा तब तक चैन की सांस नहीं लूंगा।

इसके बाद Udham Singh डायर की तलाश में रहने लगे लेकिन डायर भारत से लंदन चला गया। उधम सिंह की मुश्किलें और भी बढ़ गई थी। लेकिन उनके हौसले में किसी तरह की कमी नहीं आई थी। उधम सिंह ने ठान लिया कि अगर डायर भारत से लंदन चला गया है तो मैं उसको लंदन में जाकर गोलियों से भूनूंगा। Udham Singh ने 13 अप्रैल 1919 को घटित जलियांवाला बाग नरसंहार अपनी आंखों से देखा था। वह उसे नहीं भूल पा रहे थे हालांकि राजनीतिक कारणों के चलते हुए जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों की निश्चित संख्या कभी भी सामने नहीं आ सकी।

इस घटना ने उधम सिंह के अंदर आग सी पैदा कर दी। उन्होंने जलियांवाला बाग की मिट्टी को हाथ में लेकर कसम खाई कि जब तक मैं माइकल ओ डायर को मार नहीं दूंगा तब तक चैन की सांस नहीं लूंगा। इसके बाद Udham Singh अपने मिशन को पूरा करने के लिए कई देशों में घूमते रहे। सन 1934 में उधम सिंह लंदन गए और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपना मिशन पूरा करने के लिए 6 गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीदी।

उधम सिंह माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के सही समय का इंतजार कर रहे थे। वह अपनी प्रतिज्ञा नहीं भूले थे। वह डायर को मारे बिना चैन से कैसे रह सकते थे। रात में जब वह सोते उनकी आंखों के सामने सैकड़ों भाई होने की मौत का वह मंजर नजर आ जाता जो जलियांवाला बाग में हुआ था। वह एकदम से नींद से उठ जाते और काफी देर सोचते रहते।

आखिरकार वह मौका भी आया जब उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई बहनों की मौत का बदला लेने का मौका मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी। उसी हाल में माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। Udham Singh उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुंच गए। उन्होंने अपनी रिवाल्वर को एक मोटी किताब में छुपा लिया था। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवाल्वर के आकार में काट लिया था। जिससे रिवाल्वर किताब में अच्छी तरह से छिपाया जा सके। जैसे ही बैठक खत्म हुई दीवार के पीछे से उधम सिंह ने माइकल ओ डायर पर 2 गोलियां चला दी। दो गोलियों के लगते ही माइकल ओ डायर की मौके पर ही मौत हो गई।

उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश भी नहीं की और खुद की गिरफ्तारी दे दी। उन पर अंग्रेजों ने मुकदमा चलाया। अंत में इस महान क्रांतिकारी को 4 जून 1940 को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उधम सिंह को पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई।

ऐसे क्रांतिकारी को हम शत शत नमन करते हैं। जिसने अपने सैकड़ों भाई बहनों की मौत का बदला लेने के लिए भारत में ही नहीं लंदन में जाकर अंग्रेज अधिकारी को मौत के घाट उतार दिया।

सरदार सूबेदार सिंह, अटारी, पंजाब

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