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मां की बद्दुआओं ने कुछ ऐसा असर दिखाया कि सब कुछ सर्वनाश हो गया
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जून की तपती दोपहरी में लगभग 60 साल की एक बूढ़ी महिला अपने सिर पर बोझा लिए आ रही थी। हाथ पैर डगमगा रहे थे लेकिन उसकी हिम्मत बिल्कुल भी नहीं डगमगा रही थी। वह लगातार आगे की तरफ कदम बढ़ाए जा रही थी। आखिरकार उस बूढ़ी महिला को अपनी मंजिल मिल ही गई। वह महिला हरीहरन की मां थी।

हरीहरन अपनी मां से बहुत ही ज्यादा प्यार करता था किंतु जब से उसकी शादी हुई थी तब से उसकी और उसकी मां की बिल्कुल भी नहीं बनती थी। अक्सर हरीहरन अपनी मां को उल्टी-सीधी बातें कहता रहता है लेकिन उसकी मां मुस्कुराते हुए उसकी सभी गलतियों को माफ कर देती, और कहती बेटा तू तो बिल्कुल बदल गया। अब तू वह पहले वाला हरिहरन नहीं रहा। लेकिन हरीहरन प्यार के बदले मां को फिर उल्टे-सीधे शब्द सुना देता।

मां बेचारी चुप रहती और अपने बेटे की बातों को सुनती रहती। आखिर मां तो मां ही होती है। हरिहरन की मां का नाम उर्मिला था। हरीहरन अपनी मां का इकलौता बेटा था। अक्सर वह अपने मां को उल्टी-सीधी बकता रहता। गांव के लोग भी उसे समझाते लेकिन एक-दो दिन चुप रहता है उसके बाद वह फिर पुनः वही हरकतें करने लगता। इसी के चलते पता नहीं कब 20 साल बीत गए उर्मिला की उम्र 80 साल हो गई। उर्मिला आज भी खेतों में जाती उन्हें देखती और जानवर सहित चिड़ियों को भगाती रहती। उर्मिला अभी भी अपने शरीर से नहीं हारी थी किंतु अपने बेटे हरिहरन से हार चुकी थी।

हरीहरन की बीवी जब भी उसे कुछ उल्टी-सीधी कहानी सुनाती तो वह अपनी मां पर जाकर झगड़ने लगता। एक दिन तो हद ही हो गई। उसने अपनी मां को डंडों से पीटना शुरू कर दिया। 80 साल की बूढ़ी मां बेचारी क्या कर सकती थी। दुआ देती या फिर बद्दुआ लोगों ने आकर उसे बचाया फिर भी उसका खून खौल ही रहा था। वह लगातार यह कह रहा था कि इस बुढ़िया को जिंदा नहीं छोडूंगा। अब तो अक्सर हरिहरन अपनी बुजुर्ग मां को पीटता रहता, मगर मां क्या कर सकती थी। वह सिर्फ दुआएं ही देती रही। लेकिन जब वह पूरी तरह से टूट गई तो उसने अपने एकलौती बेटे को ही बद्दुआ देना शुरू कर दिया।

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मां की बद्दुआ में बहुत दम होता है और जितनी मां की बद्दुआ में दम होता है उससे कहीं ज्यादा उसकी दुआओं में दम होता है। लेकिन उर्मिला पर हो रहे लगातार बेटे और बहू के अत्याचार से वह बहुत दुखी हो चुकी थी। इसलिए उसने अब दुआओं की जगह उन्हें बद्दुआयें देनी शुरू कर दी। एक साल बाद ही हरिहरन का 20 वर्षीय बेटा अचानक पागल हो गया। लाख कोशिश करने के बाद भी वह ठीक नहीं हो पाया। आखिरकार उसे जंजीरों में ही बांधना पड़ा। उस पर इलाज का खर्भीच भी इतना ज्यादा हो गया था कि हरिहरन पूरी तरह से कंगाल हो गया था।

उर्मिला अभी जिंदा थी लेकिन अब उसकी आंखें अच्छी तरह से उसका साथ नहीं दे पा रहीं थीं। लेकिन वह अपने ऊपर हुए अत्याचार से दी गई बद्दुओं का नजारा साफ देख रही थी।

कुछ दिन बाद ही हरीहरन का बड़ा बेटा पूरी तरह से पागल हो गया अगर उसे छोड़ दिया जाता तो वह कुछ न करता सिर्फ अपने मां-बाप को बुरी तरह से पीटने लगता। एक दिन तो उसने हद ही पार कर दी। अपनी मां की टांग तोड़ दी और पिता का हाथ तोड़ दिया। अब शायद हरिहरन को मां की बद्दुआ का एहसास होने लगा था लेकिन वह कुछ समझ पाता इससे पहले ही उसका छोटा बेटा अचानक बीमार हुआ और मर गया।

उर्मिला अभी जिंदा थी और लाठी के सहारे आज भी १००-200 कदम आराम से चल लेती थी। हरिहरन के हालात इतने ज्यादा खराब हो गए कि उसे सब्जी की दुकान खोलनी पड़ी लेकिन यहां भी उसकी किस्मत ने साथ नहीं दिया और उसे लंबा घाटा हो गया। अब हरिहरन के समझ में नहीं आ रहा था क्या किया जाए। वह इतना नहीं समझ पा रहा था नादान अभी भी वक्त है मां से माफी मांग ली जाए। वह इस बात को सपने में भी नहीं सोच पाया और लगभग 90 साल की उम्र में उर्मिला इस दुनिया को छोड़ कर चली गई।

उर्मिला तो चली गयी लेकिन हरीहरन पूरी तरह से कंगाल हो गया एक-एक दाने अनाज को तरसने लगा। वह जो भी धंधा करता उसमें उसे घाटा हो जाता। उसका बड़ा बेटा पागल हो गया था उसकी बीवी भी अपना मानसिक संतुलन खो चुकी थी। दवाई के लिए पैसे नहीं थे सारे गहने बेचने पड़े लेकिन इसके बाद भी हरिहरन की बीवी ठीक नहीं हो सकती और उसने डिप्रेशन में आके आत्महत्या कर ली।

हरीहरन का पूरा परिवार तिनके की तरह बिखर गया। वह भी पागल सा हो गया था। इधर उधर भटकने लगा था। गांव के लोगों उसे खाना दे देते वही पड़ा रहता और पागलों की तरह घूमता रहता। उसके घर में सिर्फ उसका सबसे छोटा वाला बेटा दीपक सही था जो उस समय हरिहरन का विरोध करता था जब हरिहरन अपनी मां को बुरी तरह से पीटता था। हरिहरन का परिवार पूरी तरह से नष्ट हो गया। अब उसके परिवार में सिर्फ दीपक है। इसके अलावा एक बहन है जिसकी बहुत पहले शादी हो चुकी थी। हरिहरन आज भी पागलों की तरह भटकता रहता है उसके बड़े बेटे की भी कुछ दिनों बाद मौत हो गई। जिससे हरिहरन पूरी तरह से टूट गया। उर्मिला की बद्दुओं ने ऐसा असर दिखाया कि हरिहरन पूरी तरह से नष्ट नामूद हो गया।

मां तो मां होती है। उसके जेहन में भूल कर भी अपने बच्चों के लिए बद्दुआ नहीं आती हैं। लेकिन हर चीज की हद होती है और जब हद टूट जाती है तो फिर बद्दुआयें आती हैं। जिस तरह से मां की दुआ खाली नहीं जाती उसी तरह से मां की बद्दुआ भी खाली नहीं जाती। मां ही दुनिया की इकलौती ऐसी चीज होती है जो हर हालत में भूखे रहकर भी अपने बच्चों को पालती है और सदा खुश रहती है। हमें मां को सदा खुश रखना चाहिए। वाकी खुशियां तो अपने आप आ जाएंगी। हरिहरन शायद इस बात को नहीं समझ पाया लेकिन गांव के लोग आज भी अपने बच्चों को हरीहरन का उदाहरण देते रहते हैं।

अभिषेक मिश्रा, मधुवनी, बिहार 

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