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बाप के सामने बेटा मरता रहा किन्तु बाप आंसू बहाने के शिवा कुछ नहीं कर सका, एक सच्ची कहानी
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नमस्कार सर, मेरा नाम नूपुर सिंह चौहान है। आज मैं आप के इस मंच के द्वारा एक सच्ची घटना शेयर करना चाहतीं हूँ। आशा करतीं हूँ आपको और पाठकों को भी काफी अच्छी लगेगी।

इंसान पर जब कोई जानवर या इंसान वार करता है तो उसका जवाब वह आसानी से किसी डंडे या अन्य चीज से दे देता है। किन्तु कभी -कभी ऐसा होता है कि हमारी जान से प्यारी चीज को भी भारी नुकसान पहुँच रहा होता है और हम उसे बचाने में असहाय हो जाते हैं। आज की जो घटना मैंने बताने जा रहीं हूँ वो कुछ इसी तरह की है।

मैं एक छोटे से गाँव की रहने वाली हूँ। मेरे पडौस में ही अवधेश अंकल रहते हैं। यह घटना ८ साल पुरानी है। अवधेश अंकल का १० वर्षीय बेटा खेत पर गया था। अपने जानवरों के लिए चारा लाने। अवधेश अंकल के पास कई जानवर थे और उनकी देख रेख उनके बेटे ही करते थे।

उस दिन उनका बड़ा बेटा सुमित कहीं बाहर गया था। इसलिए जानवरों को चारा लेने के लिए १० वर्षीय अंकित को जाना पड़ा। अंकित ने खेत में जाकर चारा काटा और उसे एक व्यक्ति की मदद से अपने सिर पर रख लिया। अवधेश अंकल के खेत और गाँव की दूरी लगभग एक किलोमीटर थी।

अंकित अपने सिर पर चारा रखे आ रहा था। चारा उसके आँखों के सामने भी लटक रहा था। इसलिए वह सामने अच्छी तरह से देख नहीं पा रहा था। वह अपनी आइडिया और नीचे जमीन को देख कर चल रहा था।

अचानक उसका सिर किसी चीज से टकराया और उसके सिर पर रखा चारा जमीन पर गिर गया। इसके बाद वह धूं -धूं कर जलने लगा। दरअसल उसका सिर जमीन से लटक रहे विजली के तारों से टकरा गया था। अक्सर गाँव में खेत जाते समय बहुत कम लोग ही चप्पल इत्यादि पहनते हैं क्योंकि पानी बगैरह पड़ जाने से उन्हें हाथ में पकड़ना पड़ता है।

अंकित भी नंगे पैर था। उसको जलता देख पास ही खेतों में काम कर रहे कई लोग इकट्टे हो गए। किसी ने अंकित के पिता को सूचना कर दी तो वो भी भागते हुए आये। उस समय मैं भी मौके पर ही थीं। मैंने जो दृश्य देखा वो किसी के भी रोंगटे खड़े कर देने वाला था।

एक तरफ अंकित अब भी लगातार विजली के तार पर पड़ा जल रहा था और उसके पिता सहित वहां एकत्रित सैकड़ों लोग सिर्फ तमाशा देख रहे थे किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उस मासूम को बचा सकें। अंकित पूरी तरह से जल गया तब जाकर आग शांत हुई।

जब उस मासूम की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेजी गई तो उसकी लाश का वजन सिर्फ दो किलोग्राम था। जिसे छोटे ही कोयले की तरह बिखर जाती थी।

नूपुर सिंह चौहान, पुणे, महाराष्ट्र 


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