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माँ का अनोखा रिश्ता-Mother’s Unique Relationship

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फिक्र में बच्चों की कुछ इस कदर घुल जाती है मां
नौजवां होते हुए भी बूढ़ी नजर आती है मां

रूह के रिश्ते की गहराई तो देखिए
चोट लगती है हमें और सिसकती है मां

कब जरूरत मेरे बच्चों को हो मेरी इतना सोच कर
सो जातीं है उसकी आंखें और जागती रहती है मां

पहले बच्चों को खिलाती है सुकून और चैन से
बाद में जो कुछ बचा खुशी से खाती है मां

हर कष्ट से बच्चों को बचाने के लिए
ढाल बनती है कभी तलवार बन जाती है मां

जिंदगी के सफर में गर्दिशों की धूप में
जब कोई साया नहीं मिलता तो याद आती है मां

देर हो जाती है अक्सर घर आने में हमें
रेत पर हो मछली जैसे घबराती है मां

मरते दम घर बच्चे न आए परदेश से
अपनी दोनों पुतलियां चौखट पर रख जाती है मां

शुक्रिया कभी हो ही नहीं सकता उसका अदा
मरते मरते भी दुआ जीने की दे जाती है मां


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