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मानस में बैठी माँ...

मानस में बैठी माँ…

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आँखों में है उसे संजोये सारा गांव गिराव।
देवलोक दिखता था जब भी छूता माँ के पांव।।


बिना कहे ही मेरे मन का दर्द समझती थी
अनपढ़ होकर भी कविता का अर्थ समझती थी
शगुन मनाती थी पाहुन का सुन कागा के कांव
फूलों की पंखुड़ी जैसे थी उसकी अद्भुत डांट
शब्द-शब्द लगते थे जैसे सामवेद का पाठ
जानबूझकर भी हारा करती थी अपना दांव


आँखों में है उसे संजोये सारा गांव गिराव।
देवलोक दिखता था जब भी छूता माँ के पांव।।


पलती पीर प्राण में पर मुस्कुराती रहती थी
गीत प्रार्थना के ही हर पल गाती रहती थी
कभी भोर की धूप बन गई कभी धूप में छांव
मेरे मानस में बैठी चौपाई लिखी थी
गीता वेद कुरान बाइबिल सब में दिखती थी
और कबीरा की साखी में मिल जाती हर ठांव


आँखों में है उसे संजोये सारा गांव गिराव।
देवलोक दिखता था जब भी छूता माँ के पांव।।

बैठी देहरी पर जाने क्या सोचा करती थी
आंचल से आंखों को अपनी पोंछा करती थी
चली गई सब छोड़ अचानक सपने वाले गांव


आँखों में है उसे संजोये सारा गांव गिराव।
देवलोक दिखता था जब भी छूता माँ के पांव।।


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