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भाजपा सरकार में चरम पर पहुंची जाति पांति और छुआछूत की महामारी
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हमारे देश भारत में कई महामारियां आई और चली गई। इस समय कोरोनावायरस जैसी महामारी ने हमारे देश क्या पूरी दुनिया को तबाह करके रख दिया लेकिन कोरोनावायरस का भी हल निकलेगा और इसे भी जाना पड़ेगा। हमारे देश भारत में एक ऐसी महामारी जो हजारों सालों से चली आ रही है। उसे न तो सरकारों द्वारा रोका जा रहा है और ना ही अन्य संस्थाओं द्वारा उस पर एक्शन लिया जा रहा है। आज मैं बात कर रहा हूं भारत की सबसे बड़ी महामारी छुआछूत के बारे में। छुआछूत हमारे देश में एक ऐसी महामारी है। जिससे आम आदमी ही नहीं देश के बड़े बड़े अधिकारियों सहित वर्तमान भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद सहित उनकी पत्नी को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा।

जात पात और छुआछूत से हमारे देश को कभी भी एक सूत्र में नहीं बांधा जा सकता। क्या इस बात को हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी नहीं जानते ? क्या प्रदेशों के मुख्यमंत्री इस बात को नहीं जानते ? अगर जानते हुए भी इस पर एक्शन नहीं लिया जा रहा तो इसको क्या कहा जाएगा। आखिर मोदी सरकार जात पात और छुआछूत पर एक्शन क्यों नहीं लेती ? क्यों नहीं छुआछूत जैसी महामारी को खत्म किया जाता है ? क्या छुआछूत जैसी महामारी का इस्तेमाल कर सरकार बनाई जा सकती हैं? इसलिए इसे राजनीतिक पार्टियों द्वारा खत्म नहीं किया जाता।

अगर खत्म किया जाता तो इतनी बड़ी बड़ी महामारी आई और उन्हें खत्म किया गया लेकिन आज भी हमारे समाज में छुआछूत जैसी बीमारी इतनी तेजी से फैली हुई है। जिसके चलते एक नहीं लाखों लोगों को इस समस्या से रोजाना गुजरना पड़ता है। इतना ही नहीं इसके चलते कई लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी लेकिन छुआछूत जैसी महामारी को खत्म नहीं किया जा सका। आखिर कौन इस महामारी को खत्म करेगा ? इतना ही नहीं भाजपा सरकार में इस महामारी ने और भी विराट रूप धारण किए। जिसके चलते कई दलितों की हत्याएं तक की गई। अगर छुआछूत या जात पात के नाम पर इस तरह की घटनाएं होती हैं तो यह सिर्फ आम आदमी ही नहीं पूरे देश के लिए बहुत ही शर्म की बात है। आज मैं कुछ घटनाओं के बारे में बताऊंगा जहां पर जात पात और छुआछूत के चलते कई लोगों को मुसीबतों का सामना करना पड़ा।

उत्तर प्रदेश में घटित जात पात और छुआछूत की घटनाएं

उत्तर प्रदेश में लॉकडाउन के समय में भी छुआछूत जैसी महामारी ने लोगों को नहीं छोड़ा। कोरोना वायरस के चलते लोगों ने भी जात पात जैसी महामारी को अधिक महत्व दिया। उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में कोरोनावायरस संक्रमित और संदिग्ध मरीजों के लिए क्वॉरेंटाइन सेंटर में जब 1 दिन किसी कारण बस रसोईया नहीं आ पाई तो मानवता दिखाते हुए ग्राम पंचायत द्वारा चुनी गई महिला प्रधान ने क्वारंटाइन सेंटर में लोगों के लिए खाना तैयार कर दिया। उस महिला प्रधान ने इसलिए खाना बनाया ताकि क्वॉरेंटाइन सेंटर में लोगों को खाने की समस्या का सामना न करना पड़े। लेकिन जब खाना परोसा गया तो 2 लोगों ने यह कहकर खाना खाने से मना कर दिया की यह खाना दलित महिला द्वारा बनाया गया है। इसलिए मैं इस खाने को नहीं खाऊंगा। जानकारी उच्चाधिकारियों तक पहुंची लेकिन मामले को शांत कर दिया गया क्या यह संविधान का अपमान नहीं है आखिर उन लोगों पर सरकार द्वारा एक्शन क्यों नहीं लिया गया।

इतना ही नहीं ऐसी बहुत ही घटनाएं हैं जो पूरे देश को शर्मसार करने वाली हैं लेकिन सरकार द्वारा इन पर कोई कदम नहीं उठाया जाता। भारत के संविधान के अनुच्छेद 17 के अनुसार छुआछूत को खत्म करने की बात की गई है। भारत में किसी भी व्यक्ति के साथ अछूत जैसा व्यवहार करना दंडनीय है। इस पर सरकार द्वारा कुछ छोटे-मोटे कानून भी बनाए गए लेकिन सरकारों द्वारा इन्हें अमलीजामा नहीं पहनाया गया। इसके चलते कभी भी छुआछूत पर रोक नहीं लग पाई।

भारत में घटित छुआछूत की घटनाएं

अब मैं किसी मामूली नहीं बल्कि देश की राष्ट्रपति के बारे में बात करूंगा। जिनको 18 मार्च 2018 को ओडिशा के पुरी शहर में स्थित जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश करने पर रोक दिया गया। इतना ही नहीं राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की पत्नी सविता कोविंद के साथ मंदिर के कुछ सेवादारों ने बदसलूकी भी की।

अब आप खुद सोच सकते हैं कि जब देश के राष्ट्रपति के साथ ऐसा हो सकता है तो आम आदमी के साथ किस तरह का व्यवहार किया जा सकता है। टाइम्स आफ इंडिया लिखता है- कि राष्ट्रपति भवन से प्रकरण पर आपत्ति जताने के बाद मंदिर प्रशासन ने सेवादारों को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। प्रकरण कुछ इस प्रकार था। राष्ट्रपति महोदय अपनी पत्नी के साथ मंदिर के गर्भ गृह के पास पहुंचे तो मंदिर के लोगों ने राष्ट्रपति की पत्नी के साथ धक्का-मुक्की भी की और रास्ता रोका। लेकिन भविष्य में ऐसा सुनने को कभी नहीं मिला कि उन लोगों पर एक्शन लिया गया।

उस समय देश के प्रधानमंत्री मोदी जी ने इस बात को सीरियस तरीके से क्यों नहीं लिया। मीडिया चैनलों ने इस बात को इतने हल्के में क्यों ले लिया। क्या इसके चलते प्रधानमंत्री मोदी जी ने और मीडिया कर्मियों ने संविधान का उल्लंघन नहीं किया। क्या ऐसे लोगों को तत्काल सजा नहीं देनी चाहिए या इस तरह के मंदिरों को तत्काल बंद नहीं करा देना चाहिए यह बात सोचनीय है।

सवर्ण लोगों के साथ खाना खाने पर दलित की पीट-पीटकर की गई हत्या

हमारे देश भारत में ऐसा भी होता है। शायद बहुत कम लोग जानते हैं। 27 साल के दलित युवक जितेंद्र दास को शादी के समारोह में सवर्णों के साथ खाना, खाना इतना महंगा पड़ेगा उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। जितेंद्र दास ने सवर्णों के साथ खाना खाया। जिसके चलते जब सवर्णों को जितेंद्र दास की जाति का पता चला तो मनुवादी सोच वाले सवर्णों ने जितेंद्र को इतनी बुरी तरह से पीटा की अस्पताल में जितेंद्र दास की मृत्यु हो गई। आखिर सरकार कब तक इस तरह के कारनामों को देखती रहेगी इन पर क्यों ठोस कदम नहीं उठाया जाता।

दलित दंपत्ति को शौचालय में किया गया क्वॉरेंटाइन

मध्यप्रदेश में इतनी नीचता पर लोग आ गए कि एक दलित दंपत्ति को शौचालय में क्वॉरेंटाइन कर दिया। इतना ही नहीं उन्हें शौचालय में ही खाना खाने को भी मजबूर किया गया। क्या इस बात को सरकार ने नहीं जाना। अगर जाना तो ऐसा करने वालों के खिलाफ कठोर एक्शन क्यों नहीं लिया गया। क्या इससे जातिवाद को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है। यह कहते हुए बहुत शर्म आती है कि हम भारत देश में रहते हुए भी इस तरह की सोच रखते हैं।

लॉकडाउन में सरकार द्वारा गरीबों के साथ छुआछूत जैसा व्यवहार

पूरे भारत में इस चीज को देखा कि लाखों की संख्या में लोग लॉकडाउन में कई शहरों से घरों के लिए निकले। सरकार उन गरीबों के लिए बसों की भी व्यवस्था नहीं कर सकी। क्योंकि सरकार भी जानती है कि भारत में गरीब सिर्फ दलित ही हैं। अगर सरकार द्वारा ऐसा नहीं सोचा गया तो विदेश से अमीरों को हवाई जहाज द्वारा भारत लाया गया लेकिन गरीबों के लिए बसों तक की व्यवस्था क्यों नहीं की गई। हमारे देश में ही गरीब और दलित ऐसा महसूस कर रहे थे जैसे कि वह कोई विदेशी हो जबकि अमीर विदेशों में रहकर भी अपने देश का लुफ्त उठाने में कामयाब रहे। क्या यहां पर ऐसा आपको नहीं महसूस होता कि सरकार भी जात पात और छुआछूत को बढ़ावा देती नजर आई।

लॉकडाउन के समय में दलितों पर अत्याचार चरम पर पहुंच गया। इतना ही नहीं जहां सवर्णों ने दलितों पर अत्याचार किया तो दूसरी तरफ सरकार ने भी अप्रत्यक्ष रूप से उन्हीं लोगों की मदद की जिन लोगों ने दलितों को रौंदने की कोशिश की।

सरकार खुद अंतर्जातीय विवाह करने वालों को प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा करती है। वहीं दूसरी तरफ अंतर्जातीय विवाह करने पर दलितों को बुरी तरह से मारा-पीटा जाता। यहां तक उनकी हत्या तक की जा रही। बिहार में एक सवर्ण जाति की लड़की से शादी करने वाले विक्रम नाम के व्यक्ति की संदिग्ध हालत में हत्या कर दी गई। उसकी मौत की जांच की मांग करने वाले संतोष को पुलिस ने बुरी तरह से पीट-पीटकर मार डाला।

स्वतंत्र भारत में दलितों को स्वतंत्र रहने की आजादी नहीं है। हरियाणा में दलित परिवार पर लाइट बंद करने के पीएम के आहान का पालन नहीं करने पर दबंग लोगों ने जमकर पीटा। दूसरी तरफ यमुनानगर जेल में बंद बाल्मीकि समाज के रमन नामक व्यक्ति की संदिग्ध हालत में मौत ने लॉकडाउन में भी दलितों को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया। इतना करने के बाद हरियाणा सरकार ने जांच के आदेश दिए। इससे पहले हरियाणा सरकार ने एक्शन क्यों नहीं लिया। इस बात का जवाब कौन देगा।

राजस्थान में एक दलित लड़की के साथ बलात्कार किया गया और दलित समाज के डूंगर राम मेघवाल को राजपूतों ने दिनदहाड़े मौत के घाट उतार दिया। लॉकडाउन में दलितों को जीना दुश्वार कर दिया गया। मध्य प्रदेश के शिवपुरी में 7 मई को बुद्ध पूर्णिमा मनाने की वजह से दलित गजराज जाटव की हत्या कर दी गई। इतना ही नहीं शर्म उस वक्त आती है जब उज्जैन के एसडीएम आदेश देते हैं कि दलितों को शादी से 3 दिन पहले पुलिस को सूचना करनी होगी। आखिर प्रशासनिक अधिकारियों में इस तरह की बात करने की हिम्मत कैसे आती है। जहां इन्हें समाज की सुरक्षा और देखभाल के लिए कुर्सियां दी जाती हैं जबकि यह उसका नाजायज फायदा उठाते हैं। और सरकारें उसका तमाशा देखतीं हैं।

सरकार द्वारा भी किए गए भेदभाव को भुला नहीं जा सकता। जहां एक तरफ कोरोना काल में डॉक्टरों को कई तरह के सुरक्षा साधन उपलब्ध कराये जा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ सफाई करने वाले सफाई कर्मियों को सुरक्षा उपकरण भी नहीं उपलब्ध कराये जा रहे हैं। इसका प्रमुख कारण सफाई करने वालों में प्रमुख रूप से दलित ही होते हैं। इसलिए सरकार द्वारा भी उनका अनदेखा किया जा रहा है।

गांव में बने क्वारंटाइन सेंटरों में जाकर सफाई करने वाले सुरक्षाकर्मियों के पास किसी तरह की कोई सुरक्षा किट नहीं है। इसके बावजूद भी वह अपनी जान जोखिम में डालकर साफ सफाई कर रहे हैं। इतने तक ही सीमित नहीं है उन्हें मिनिमम तनख्वाह भी नहीं दी जा रही है। सरकार द्वारा जहां ऐसे हालात सफाई कर्मियों के किए जा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ दबंग लोग भी सफाई कर्मियों के साथ बेहद बुरा व्यवहार कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के रामपुर में एक सफाई कर्मचारी को सैनिटाइजर जबरदस्ती पिलाया गया। वह सफाई कर्मचारी गांव में सैनिटाइजर का छिड़काव करने गया था। इसके चलते अस्पताल में उस सफाई कर्मचारी की मौत हो गई। क्या इस तरह की घटनाएं दिल दहला देने वाली नहीं है। इस तरह की घटनाओं को अंजाम क्यों दिया जा रहा है ? क्या इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने वाले लोगों को सरकार का कोई खौफ नहीं है या सरकार खुद अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे लोगों की मदद कर रही है। अगर मदद नहीं कर रही है तो इस तरह की घटनाएं सामने क्यों आ रही हैं। क्यों ऐसे लोगों पर सरकार द्वारा नकेल नहीं कसी जा रही है। कब तक दलितों के साथ छुआछूत और भेदभाव जैसा आचरण किया जाएगा। इस पर सरकार को गंभीरता से सोचना होगा।

एक नहीं ऐसी सैकड़ों घटनाएं रोजाना हमारे देश में घटित होती हैं लेकिन सरकार इस तरह की घटनाओं की अनदेखा करती आ रही है। आखिर छुआछूत निवारण जैसा कठोर कानून क्यों नहीं बनाया जाता। जिससे समस्त भारतवासी एक सूत्र में बंद कर रह सके। राजनीतिक दलों को भी इस पर सोचना चाहिए अगर राजनीतिक दल इस पर नहीं सोचते तो वर्तमान में भाजपा सरकार को इस पर ठोस कदम उठाना चाहिए।

अगर इसी तरह का माहौल चलता रहा तो देश में ही एकता और अखंडता खत्म हो जाएगी। देश में ही लोग एक दूसरे के दुश्मन बन जाएंगे। भारत सरकार को छुआछूत जैसी महामारी को तत्काल खत्म करना चाहिए और सभी को समान अधिकार देने चाहिए। अगर इस तरह की कोई घटना सामने आती है तो उस पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। जिससे अन्य दूसरा व्यक्ति छुआछूत जैसी किसी भी घटना को अंजाम न दे सके।

अमर मिश्रा, पटना, बिहार 

सरकारी नौकरी 


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