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भिखारिन- A Great Mother

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शहर में भीड़ इतनी ज्यादा थी की रोड को पार करना भी बहुत मुश्किल था। इसके बावजूद भी लगभग 65 साल की एक बूढ़ी औरत हाथ में कटोरा लिए लोगों से भीख मांग रही थी। कुछ लोग रहम खा कर उसके कटोरे में कुछ सिक्के डाल देते तो कुछ लोग उसे डांट कर भगा देते। दिन भर भीख मांग कर वह बूढ़ी औरत 100 से 150 रुपए तक कमा लेती थी। जिससे उसका आटा, दाल, चावल इत्यादि सामान आता था। कभी-कभी वह उन लोगों की भी मदद कर देती थी जो पूरी तरह से अपाहिज थे। उस बूढ़ी औरत के पास पैसे के नाम पर कुछ भी नहीं था लेकिन इसके बावजूद भी भीख मांग कर वह लोगों की मदद करती थी। कई बार उसने उन बच्चों की मदद की जो सड़क पर एक-एक दाने को तरसते रहते हैं।

अमीरों के दिल में इतनी बड़ी जगह नहीं होती है लेकिन वह बूढ़ी भिखारिन भीख मांग कर अपना पेट पालती थी और साथ में कई लोगों की कई तरह से मदद भी करते थी। बस इसी तरह उसकी जिंदगी गुजर रही थी। रहने के नाम पर रोड के किनारे पॉलिथीन का बना हुआ एक तंबू जैसा मकान था। जिसमें गुजर बसर करती थी। अगर बारिश हो जाती तो कभी-कभी पूरी रात उसे जागना पड़ता था। मैं उसे अक्सर देखता और उसके बारे में सोचता रहता।

मेरे दिमाग में कई बार विचार आया कि उस बूढ़ी भिखारिन से बात करुं। लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया। वह भिखारी होते हुए भी बहुत ही अमीर थी। उसके पास सब कुछ था जो इंसान गरीबों की मदद कर सकता है. असहाय लोगों को पाल सकता है। उससे बड़ा अमीर कौन हो सकता है। बस यही सब सोचकर मैं उसके पास नहीं पहुंच पा रहा था लेकिन एक दिन मैंने अपनी पूरी हिम्मत बटोरी और उस भिखारिन के पास पहुंच गया।

मैंने उसको प्रणाम किया तो उसने धीमी सी आवाज में मुझे आशीर्वाद दीया जीते रहो बेटा। मैं जाकर उस भिखारिन के पास ही बैठ गया। उसने पूछा क्या बात है बेटा। मैंने कहा कोई बात नहीं माता जी बस यूं ही आपसे बात करने का दिल कर रहा था इसलिए आपके पास आ गया। धीरे-धीरे हम दोनों के बीच बातों का सिलसिला शुरू हो गया और मैंने अचानक ही पूछ लिया मां जी क्या आपके कोई संतान नहीं है। मेरे इस सवाल को सुनते ही वह उदास सी हो गई। मैंने उससे दोबारा फिर वही प्रश्न पूछा लेकिन उसने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। मैं भी शांत हो गया लेकिन फिर उस भिखारिन ने बताया। बेटा मेरे तीन बेटे हैं और तीनों बेटे सरकारी नौकरी करते हैं लेकिन मेरी किस्मत ही ऐसी है जो मुझे दर-दर की ठोकरें खाकर भीख मांगने पड़ रही है।

मैंने उस बूढ़ी भिखारिन से पूछा आखिर आप अपने बच्चों के पास क्यों नहीं रहती हैं। इतना सुनते ही वह फिर उदास हो गई लेकिन कुछ पल बाद ही उसने मुझे जो बताया उसको सुनकर मैं खुद सन्न रह गया। काफी दर्द भरी कहानी थी उस भिखारिन की।

भिखारी ने बताया मेरा परिवार बहुत ही सुखी था किसी चीज की कमी नहीं थी। मेरे पति एक कंपनी में नौकरी करते थे। धीरे-धीरे मैंने 4 बच्चों को जन्म दिया जिसमें से एक की जन्म के समय ही मौत हो गई। लेकिन तीन बच्चे भगवान की दुआ से सलामत रहे। बच्चे बड़े होते रहे हम उन्हें देखते रहे। कब उनकी शादियां हो गई मुझे पता ही नहीं चला।

मेरे आखरी सबसे छोटे बच्चे की शादी के 3 दिन बाद ही मेरे पति की मौत हो गई। जिसका मुझे और मेरे परिवार को बहुत बड़ा सदमा लगा। लेकिन मौत तो एक सच है। जो सबको आनी है इसलिए सच समझ कर हम लोग सब कुछ भूलते गए। वक्त गुजरता गया हमारे बच्चों की नौकरियां लगती गईं। उनके पास जैसे-जैसे पैसा बढ़ता गया वैसे-वैसे हमारे लिए उनके दिलों से प्यार घटता गया।

एक दिन ऐसा भी आया कि मेरे तीनों बच्चों ने मेरे लिए यह की योजना बनाई और मुझे वृद्ध आश्रम भेजने का निर्णय लिया। लेकिन जब मुझे इस बात का पता चला तो मुझे बहुत ही धक्का लगा। मैंने अपने तीनों बेटों से हाथ जोड़कर विनती की कि बेटा मैं किसी कोने में पड़ी रहूंगी लेकिन मुझे वृद्ध आश्रम मत भेजो। लेकिन मेरे बच्चों और बहूओं का शायद वह आखरी फैसला था। इसलिए मैंने उस घर को ही छोड़ दिया।

घर को छोड़ने के बाद मैंने कई घरों में झाड़ू पोछा करने का काम शुरू कर दिया। लेकिन वहां भी मेरे बुढ़ापे ने साथ नहीं दिया और लोगों ने मुझसे काम कराना बंद कर दिया। मैंने बहुत कुछ सोचा लेकिन मेरी समझ में कुछ नहीं आया और आखिरकार मैं चौराहे पर जाकर भीख मांगने लगी। मैं भी उतनी ही भीख मांगती थीं जितने मुझे जरूरत होती थी। लेकिन मुझे ऐसा लगा कि मेरे आस-पास कुछ लोग ऐसे भी हैं जो मुझसे भी बदतर हालत में जिंदगी गुजार रहे हैं। इसलिए मैंने और कड़ी मेहनत करनी शुरू कर दी जिससे मैं अब खुद का पेट पालती हूं और साथ में ही उन लोगों का भी पेट पालती हूं जिनको वास्तव में जरूरत होती है।

उस भिखारिन की कहानी सुनने के बाद मेरी आंखों से आंसुओं की बारिश सी होने लगी। मैंने उस बूढ़ी भिखारिन से कहा मां जी यह उम्र आपके भीख मांगने की नहीं है। आप ऐसा करो मेरे साथ चल कर रहो मैं जैसी भी रूखी सूखी खाता हूं आपको भी खिलाऊंगा। लेकिन बीच में ही उस भिखारिन ने मुझे टोक दिया और कहा बेटा मैं तो अपना पेट भर लूंगी लेकिन उनका क्या होगा जिनका पेट मैं भरतीं हूं। इतना सुनते ही मेरे दिल से एक चीख निकल पड़ी। मैंने उस भिखारिन की महानता के बारे में सोच कर मुझे बहुत ही गर्व हुआ।

मैं इतना सब कुछ होते हुए भी एक व्यक्ति की भी मदद नहीं कर पा रहा हूं। लेकिन एक भिखारी जो एक नहीं कई लोगों की सिर्फ मदद के लिए भिखारिन बनकर जीना चाहती है। मैंने उस महान माता के पैर छुए इसके बाद उस मां ने मुझे आशीर्वाद दिया और मैं वहां से उठ कर चला आया। क्योंकि मेरे पास और कुछ भी कहने के लिए शब्द नहीं बचे थे। मैं अक्सर उस भिखारिन को देखता रहता और खुद के बारे में भी सोचता रहता।

5 साल तक मैं उस भिखारिन से अक्सर किसी न किसी बहाने से मिलता रहा लेकिन एक दिन जब मैं उसकी उस झोपड़ी के पास गया जहां वह रहती थी। सन्नाटा छाया हुआ था। मैंने वहां के लोगों से पूछा की इस घर में रहने वाली बूढ़ी मां कहां है। लोगों ने बताया आज सुबह ही उनका इंतकाल हो गया। मैं इतना रोया शायद जीवन में कभी भी नहीं रोया था।

मुझे ऐसा लग रहा था कि मैंने अपनी जिंदगी से एक ऐसा हीरा खो दिया है। जिसकी कोई कीमत नहीं थी। आज भी जब मैं उधर से गुजरता हूं तब मुझे उस बूढ़ी भिखारिन की याद आ जाती है और उसके द्वारा बताई गई बातें मेरे जेहन को झकझोर देती हैं। आज वह बूढ़ी मां तो नहीं है लेकिन उसके द्वारा कहीं गई कुछ ऐसी बातें जिनकी बदौलत मैं आज खुद एक ऐसी संस्था चला रहा हूं जिसमें मैं असहाय और बुजुर्गों को पनाह देता हूं।

डॉ. उदय प्रताप सिंह, कन्नौज, उत्तर प्रदेश 

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