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एक अधूरी प्रेम कहानी, दर्द की इन्तहां
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हेलो सर, मेरा नाम अविरार ठाकुर  है। मेरी एक प्रेम कहानी है जिसे मैं आप के ट्रुथ मंथन प्लेटफॉर्म के जरिये लोगों तक पहुंचाना चाहता हूँ। सर मेरी इस प्रेम कहानी को पब्लिश जरूर करिये मैं आपका बहुत आभारी रहूँगा।
मेरी उम्र इस समय 39 साल है। जब मैं बारहवीं की परिक्षा दे रहा था उस समय मेरी मुलाक़ात आकांक्षा नाम की लड़की से हो गई। मैं पढ़ने में शुरुआत से ही काफी अच्छा था। बारहवीं में भी मैं पढ़ने में काफी अच्छा था। उस समय तक प्यार क्या होता है इस बारे में ज्यादा नहीं जानता था। आकांक्षा को जब मैंने पहली बार देखा तो अचानक से मेरे अंदर प्यार की चिंगारी फूटी। वो द जे बी पेटिट स्कूल फॉर गर्ल्स, मुंबई में पढ़ती थी। मेरी किस्मत से उसका भी एग्जाम सेंटर उसी स्कूल में आ गया जिसमे मेरा गया था। आकांक्षा मेरे आगे वाली सीट पर बैठी थी।

अचानक मेरे अन्दर बदलाव आने शुरू हो गए। मैं अक्सर एग्जाम सेंटर पर काफी जल्दी पहुँच जाता था। इसी बीच आकांक्षा से मेरी कुछ बातें भी हो जातीं थीं। धीरे -धीरे हम लोग काफी नजदीक आ गए और हमारा प्यार काफी मजबूत हो गया। वो मुझे भी पसंद करती थी और अब तक मैं तो उसका दीवाना सा हो गया था। हम लोगों का एग्जाम ख़त्म हो गया। उसने मुझे अपनी कालोनी का पता दिया और वो चली गई। उस दिन मेरी उससे आख़िरी मुलाक़ात थी।

दो तीन दिन तो मेरे घर पर गुजर गए किन्तु इसके बाद मुझे बचैनी सी बढ़ गई। मैं अपने एक दोस्त विमल के साथ उसकी कालोनी में बाइक से गया और पूरी कालोनी में घूमता रहा किन्तु वो मुझे नहीं मिली। मैं बहुत परेशान रहने लगा। मुझे आकांक्षा से सच में प्यार हो गया था। मैं लगातार तीन महीने तक उसकी कालोनी के चक्कर लगाता रहा किन्तु वो मुझे कभी नहीं मिली। मैं पूरी तरह से टूट गया था। उस समय मोबाइल भी नहीं थे। जो मैं उसका नंबर ले लेता। मैं काफी कमजोर भी हो गया था। मेरे मम्मी और पापा अक्सर मेरे गुमसुम रहने का कारण भी पूछते थे किन्तु मैं उन्हें टाल देता।

बारहवीं का परीक्षा परिणाम आ गया था। मैं भी अच्छे नंबरों से पास हुआ था और आकांक्षा भी अच्छे नंबरों से पास हो गई थी। मैं उसका रोल नंबर ले रखा था किन्तु उससे सिर्फ रिजल्ट ही देखा जा सकता था।

बारहवीं का परिणाम आने के 15 दिन बाद मैं एक दिन मुंबई से पुणे जा रहा था। ट्रेन में मैं अपनी सीट खोज रहा था, इतने में मेरी नजर सामने पड़ी तो मेरी आँखों से आंसू छलक आये। सामने आकांक्षा खड़ी थी। मैं सब कुछ भूल गया और उसके पास जा बैठा। उसके साथ में उसकी मम्मी और एक लगभग 10 साल का छोटा भाई भी था। इसलिए मैं उसके सामने बैठ गया किन्तु उससे बात नहीं कर सका। धीरे -धीरे अजनावियों की तरह उसने मुझसे बात शुरू की। उसे भी खुसी थी किन्तु इतनी नहीं जितनी मुझे। वह मुझे भूली नहीं थी बस मैं इसी बात से खुस था।

मैं उससे और उसकी मम्मी से भी बातें करता रहा किन्तु वो आम बातें जो लोग ट्रेन में सफ़र करते समय करते हैं। पुणे सिर्फ 5 किलोमीटर दूर था कि अचानक ट्रेन रुक गई। कुछ लोगों ने पटरी पर जाम लगा रखा था और प्रदर्शन कर रहे थे। लेकिन मुझे उनसे कोई मतलब नहीं था। सब आपस में कई तरह की बातें करने लगे। मैं भी काफी चिंतित होने लगा था। अचानक एक पत्थर ट्रेन के अन्दर आया और आकांक्षा की मम्मी के मस्तक पर आ लगा। पत्थर लगते ही उनके माथे से तेजी से खून बहने लगा और वो बेहोश सी होने लगीं। मैंने अपना रूमाल निकाला और जहां पर पत्थर लगा था। उस स्थान को दबा लिया खून इतना अचानक बह गया था कि उसे देखने के बाद आकांक्षा को भी गस खा गई। फिलहाल एक घंटे बाद ट्रेन वहां से चली और पुणे पहुंची।

पुणे पहुँचने के बाद मैंने किसी तरह से उन तीनो लोगों को सम्हाला और नजदीक के अस्पताल में ले गया। डॉक्टर द्वारा आकांक्षा की माँ की पट्टी की गई और उसके बाद वह थोड़ा स्वस्थ हुईं। इसके बाद जिसका जो भी प्लान था उसे कैंसिल कर दिया और हम सब लोग मुम्बई आ गए। मैं उन सभी को उनके घर छोड़ने गया।

इसके बाद मैं अक्सर आकांक्षा के घर आता और जाता रहता था। उसकी माँ भी मुझे बहुत पसंद करने लगी थी। इसी तरह आना जाना कब हम दोनों के प्यार में बदल गया। फिलहाल मैं तो पहले से ही आकांक्षा को बहुत ही प्यार करता था। आकांक्षा के पापा फ़ूड इन्स्पेक्टर थे और अक्सर बाहर ही रहते थे।

हम दोनों के स्नातक का अंतिम वर्ष था। उसी साल एक ऐसा तूफ़ान आया जिसमे मेरा सब कुछ बहकर तबाह हो गया। आकांक्षा के एक ही छोटा भाई था। आकांक्षा के मम्मी -पापा और उसका छोटा भाई किसी काम से पुणे जा रहे थे और उसी समय रोड हादसे में उन तीनो की मौत हो गई। आकांक्षा पर तो पहाड़ सा टूट गया और मेरी दुनिया भी उथल पुथल हो गई।
आकांक्षा उस घटना को बर्दास्त नहीं कर पायी और डिप्रेशन में चली गई। मैंने उसका लाख सपोर्ट किया किन्तु वह पूरी तरह से पागल हो गई। मैंने भी उसे प्यार किया था। इसलिए उसे मैं इस हाल में नहीं छोड़ सकता था। मैंने उसका बहुत इलाज कराया किन्तु वो दवाइयाँ खाती ही नहीं थी। मैं उसे अपने घर ले आया और उसकी देख रेख मेरे सहित मेरा परिवार भी करने लगा।

मेरी अंतिम वर्ष की परीक्षाएं भी छूट गईं थी। मैं भी काफी परेशान था। मेरा दिमाग भी काम करना बंद कर चुका था। मैं सोचता कुछ और लेकिन होता कुछ और ही था। मैं घंटों आकांक्षा के सामने बैठ कर उसे देखता रहता। एक वर्ष के बाद उसके चाचा और चाची आये किन्तु उन्होंने भी उसकी हालत देखी और घर वापस लौट गये। उन्होंने एक बार भी आकांक्षा को अपने साथ ले जाने के लिए नहीं कहा।

मेरे मम्मी -पापा भी अब हमसे नाराज होने लगे थे, किन्तु मैं आकांक्षा का साथ छोड़ने वाला नहीं था। लेकिन शायद भगवान को कुछ और ही पसंद था। एक दिन मैं आकांक्षा के इलाज हेतु श्री सईदत्त मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल, मुंबई ले गया। उसको डॉक्टर ने अच्छी तरह से देखा और जांच की, इसके बाद बताया कि इन्हें 6 से 7 महीने पूरी तरह से ठीक होने में लग जायेंगे। मैं बहुत खुश था। उस डॉक्टर की बात सुनकर मुझे जिन्दगी की सबसे ज्यादा खुशी मिली थी। मैंने कुछ दवाएं ली और आकांक्षा को लेकर बाहर आकर टैक्सी का इंतज़ार करने लगा। अचानक आकांक्षा ने झटके से मेरे हाथ से अपना हाथ छुड़ाया और रोड की तरफ भाग खड़ी हुई। इससे पहले मैं कुछ करता या सोंचता उससे पहले ही सामने से आती एक कार ने आकांक्षा को जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर लगते ही उसकी मौत हो गई सिर्फ मेरे पहुँचने तक उसकी कुछ साँसे बांकी थीं।

मैं पागलों की तरह वहां चीखता रहा लेकिन कोई भी मेरी मदद करने नहीं आया। मैं आकांक्षा को गोदी में लिए पागलों की तरह रोड पर बैठा रहा। आखिर कार एक ऑटो वाले ने मुझे और आकांक्षा को सम्हाला। उसके बाद मैं भी अपनी जिन्दगी की आधी से ज्यादा खुशियों खो चुका था। मैंने उसी दिन कसम खाई और आज तक मैंने किसी लड़की से शादी नहीं की है।
मैं अब एक कंपनी में नौकरी करता हूँ किन्तु आकांक्षा की यादें आज भी हमारे साथ रहतीं हैं और मैं भी उसकी यादों में अपनी जिन्दगी गुजार रहा हूँ।

– अविरार ठाकुर, मुंबई, महाराष्ट्रा 


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