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एक ऐसा महापुरुष जो अपने दुखों को भूलकर दूसरों की खुशियों के लिए जीता रहा

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आज मैं इस लेख के माध्यम से एक ऐसे महान पुरुष के बारे में बताने जा रहा हूं। जिसने अपने सुखों को त्याग दिया और दूसरे लोगों के दुखों को सदैव अपना समझता रहा। अंतिम समय तक उनका यही उद्देश्य रहा इस समाज में कोई भी गरीब व्यक्ति न रहे, अनपढ़ न रहे, भूखा न रहे और बीमार न रह सके।

उस महान व्यक्ति का नाम सोहनलाल था। सोहन लाल जी का जन्म 23 मार्च 1939 को हरदोई जनपद के ग्राम हसनापुर में हुआ था। सोहनलाल जी का परिवार शुरुआती दौर से ही गरीबी में पला था। इसीलिए शायद उन्हें गरीबों की मदद करने में अच्छा लगता था। बचपन में पढ़ाई के दौरान उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जमीदारी प्रथा के चलते उनको पढ़ने के लिए काफी मुसीबतों से गुजर कर पढ़ाई करनी पड़ी। परिवार की इतनी आय नहीं थी कि परिवार के सदस्य उन्हें पढ़ा सकते।

किसी तरह प्राइमरी तक पास करने के बाद उनकी पढ़ाई बंद होने के कगार पर आ गई। पढ़ाई बंद न हो इसके लिए उन्होंने गांव में ही दूसरों का काम करना शुरू कर दिया और उससे जो भी पैसे मिलते अपनी पढ़ाई मैं लगाते थे। कभी-कभी तो ऐसा हो जाता था कि घर में मिट्टी का तेल न होने के कारण दूसरों के घरों में जाकर पढ़ना पड़ता था। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और आगे ही बढ़ते रहें। किसी तरह दसवीं तक पास होने के बाद अब उनके पास कोई ऐसा साधन नहीं था जिससे वह इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर सकते हैं।

अंततः उन्होंने लकड़ियां काटनी शुरू की उनको सुखाते और बाजार में बेच आते। इसके अलावा गोबर के उपले बनाते और उन्हें बाजार में बेचते। इतना सब कुछ करने के बाद उन्होंने इंटर तक पढ़ाई की। इंटरमीडिएट की पढ़ाई के बाद अब ऐसा कोई भी विकल्प सोहन लाल जी के पास नहीं था जिससे वह आगे की पढ़ाई कर सकते। अंततः उन्हें इंटर के बाद ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी।

उसी समय उनकी नौकरी प्राइमरी अध्यापक के रूप में लग गई। जनपद हरदोई के कछौना में ट्रेनिंग करने के बाद उन्हें नियुक्ति दी गई। वह स्कूल में सदैव बच्चों को बहुत ही मेहनत से पढ़ाते थे। आखिरकार 1984 में उन्हें “बेस्ट टीचर ऑफ डिस्ट्रिक्ट” के अवार्ड से सम्मानित किया गया। अभी भी उनके अंदर की लगन रुकने का नाम नहीं ले रही थी। उन्होंने प्राइवेट स्नातक और परास्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद उनका लक्ष्य गरीब बच्चों को पढ़ाने का बन गया। स्कूल में जो भी बच्चे आते और जो भी फीस नहीं भर पाते उनकी फीस वह स्वयं अपनी तनख्वाह से भरते थे। गांव में अगर कोई भी बीमार हो जाता तो उसे तत्काल उठाकर अस्पताल ले जाते और उसका उपचार कराते थे।

उनका नाम क्षेत्र में ही नहीं चारों तरफ फैल गया था। उनके स्कूल में बेशुमार बच्चे पढ़ने आते थे। क्योंकि उनका लक्ष्य सिर्फ पढ़ाना ही था। अंधविश्वास के वह घोर खिलाफ थे। अंधविश्वास से लोगों को निकालते। गाँव में लोगों को बताते कि भूत और आत्माओं जैसी चीजें नहीं होतीं हैं। उस समय गांव के लोग दवा से ज्यादा अधविश्वास में यकीन करते थे। इसके बावजूद भी सोहन लाल जी ने लोगों को भारी संख्या में जागरूक किया।

एक बार की घटना है। मास्टर साहब अपने स्कूल गए हुए थे। तभी उनके गांव में एक व्यक्ति को निमोनिया हो गया। गांव के कई झाड़-फूंक करने वाले लोग वहां इकट्ठे हो गए और उसे अंधविश्वास के चक्कर में मारने पीटने लगे। लगभग 2 घंटे तक वह बीमार व्यक्ति उन लोगों के बीच पिसता रहा। सोहन लाल जी जब 4:00 बजे अपने स्कूल की छुट्टी करके घर आए तो उन्हें पता चला तो वह तत्काल उस व्यक्ति के पास गए। उन्होंने उसे अच्छी तरीके से देखा और वाहन किया और उस बीमार व्यक्ति को डॉक्टर के पास ले गए। डॉक्टर ने कहा मास्टर साहब इस व्यक्ति को निमोनिया हो गया है और अगर आप इसे 1 घंटे और नहीं लाते तो शायद यह बच नहीं पाता। तीन दिन तक इलाज के बाद वह व्यक्ति ठीक हो पाया। यह एक ऐसी घटना नहीं है ऐसी हजारों घटनाएं हैं जिनमें सोहन लाल जी ने लोगों की जान बचाई।

स्कूल में अक्सर गरीब बच्चों की फीस खुद भरते थे हालांकि उस समय फीस बहुत ज्यादा नहीं थी किंतु तनख्वाह भी नाम मात्र की ही मिलती थी। लेकिन इसके बावजूद भी उन्होंने अपने हौसलों को कभी थमने नहीं दिया। वह सदैव गरीबों की मदद करते रहे और असहाय बच्चों को पढ़ाते रहे।

सन 1996 में उनकी अचानक हालत खराब हो गई और कई महीनों तक वह बीमार रहे। अंततः 12 जून 1997 को उन्होंने अंतिम सांस ली और स्वर्ग सिधार गए। इस खबर के फैलते ही पूरे क्षेत्र में मातम सा फैल गया। सोहन लाल जी के घर पर हजारों लोगों की भीड़ जमा हो गई। लोग तारीफ करते नहीं थक रहे थे। उनके पढ़ाये हुए बच्चे अब नौकरियां कर रहे थे। उन्हें जब पता चला तो वह अपने जज्बातों को बयां नहीं कर पा रहे थे।

आज लगभग 24 साल बाद भी लोग उन्हें नहीं भूल पाए हैं। उन्होंने लोगों के दिलों पर ऐसी छाप छोड़ी कि जब भी पढ़ाई की बात होती है तो उनका नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। एक शिक्षक होते हुए भी उन्होंने समाज की सेवा के साथ-साथ लोगों के दिलों से अंधविश्वास जैसी कुरीतियों का भी खात्मा किया।

लेखक – अंजुल भारती, उत्तर प्रदेश


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129 thoughts on “एक ऐसा महापुरुष जो अपने दुखों को भूलकर दूसरों की खुशियों के लिए जीता रहा”

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