Truth Manthan

साथी
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साथी: बात उन दिनों की है जब मैं पढ़ता था। यह साल 2010 था, हम तब अपने स्नातक के आखिरी साल में थे। यह हादसा तब हुआ था जब उन्हीं दिनों हमें अपने कॉलेज से CAT की परीक्षा देने के लिए पुणे जाना था। उस घटना को जानने से पहले हमें थोड़ा प्रारम्भिक परिस्थितयों से अवगत होना पड़ेगा।

तब कॉलेज के और सहपाठी CAT एग्जाम को लेकर इतने सीरियस नहीं थे। अपनी क्लास से मैंने और मेरे रूममेट ने फॉर्म भरा था, पर मेरा रूममेट भी बहुत सीरियस नहीं था। उन्हीं दिनों मेरे रूममेट की एक गर्लफ्रैंड हुआ करती थी, नाम था शोभना। बातों बातों में पता चला कि शोभना की साथी कृति ने भी CAT का फॉर्म भरा है और इसको लेकर वो काफी गंभीर भी है। जानकर अच्छा लगा कि कम से कम एक साथी तो मिलेगा। अगले ही दिन शोभना की मदद से हम मिले और फिर नम्बर एक्सचेंज किया और तैयारी शूरु हो गई। कृति पढ़ने में बहुत होशियार थी उससे मुझे काफी मदद मिली। देखते ही देखते एग्जाम का भी टाइम आ गया, सेन्टर कॉलेज से 400 KM दूर पुणे में था।
कृति का पुणे जाना भी एक समस्या ही थी। कॉलेज हॉस्टल से किसी भी लड़की का ऐसे अकेले इतनी दूर जाना निषेध था। उसे बाहर जाने के लिए लड़की के अभिभावक की मंजुरी फ़ोन पर ज़रूरी थी। कृति के पापा पहले ही मना कर चुके थे कि CAT अगले साल दे देना पर ऐसे अकेले या किसी लड़के के साथ परीक्षा देने पुणे जाना उचित नहीं। पर कृति की तैयारी बहुत अच्छी थी और वो एग्जाम मिस नहीं करना चाहती थी। मैं भी शायद यही चाहता था। हमने मिलकर एक तरक़ीब निकाली, मेरे रूममेट ने कृति की वार्डन से कृति के पापा बनकर बात की।

साथी के साथ सफ़र 

तय दिन पर मैं कृति और इलेक्ट्रॉनिक्स डिपार्टमेन्ट की एक लड़की जिसका नाम निशा था, को जाना था। पर प्रस्थान के एक दिन पहले ही निशा ने बहाना बना दिया कि मेरी तैयारी सही नहीं है इसलिए मेरा जाना व्यर्थ ही होगा। हमारी परेशानी और बढ़ गई। अब बस हम दो ही थे जिन्हें जाना था। कौन जाएगा, कौन नहीं के चक्कर में हम बस की टिकट करवा नहीं पाए थे, ट्रेन वहाँ थी नहीं। बस वाले ने बताया कि 2/1 बस है नीचे सीटर और ऊपर स्लीपर, डबल साइड फुल है सिंगल साइड के पीछे में एक स्लीपर और एक सीट खाली है। मैंने साथी कृति को सारी बात बताई तो उसने हामी भर दी, मैंने एक स्लीपर और एक सीटर की रसीद कटा ली।

रविवार को हमारा एग्जाम था, शुक्रवार के शाम की बस थी हमारी। पुणे पहुँच कर दोनों को अपने अपने साथी के पास रुकने का तय था। इसलिए हम एक दिन पहले ही निकले, ताकि परीक्षा के दिन कोई हड़बड़ी न हो जाए। बस स्टैंड से बस रात के 8:30 में खुली और इसे पुणे 5:30 में पहुंचना था। बस खुल चुकी थी और कृति को सीटर में बिठा कर मैं स्लीपर में चला गया। चुकि मैं स्लीपर में था तो मैंने अपना बटुआ फ़ोन सब अपने बैग में रखकर आराम से सो गया।
रात के करीब 1:20 बजे बस एक पुराने से गैराज और ढ़ाबे के पास रुकी, मैं बेसुध सो रहा था। कृति मेरे पास आई और सकुचाते हुए कहा कि ‘नैचुरल इमरजेंसी’ है। मैं उसके साथ नीचे आ गया, वहीं पर एक पानवाले की दुकान थी, मैंने उससे पूछा कि इधर शौचालय है क्या? उसने हँस दिया और कहा कि सड़क के उस तरफ चले जाओ, उस घर के पीछे शौचालय ही शौचालय है। मैं थोड़ा परेशान हुआ, ये बातें कृति को बताई। वो रुआँसा सी हो गई। मैं स्थिति को भाँपते हुए बस वाले के पास गया। जो आदमी सामान चढ़ा रहा था उसे मैंने कहा कि आपलोग थोड़ा इन्तेज़ार कर लेंगे हम अभी उस सड़क के पार से आते हैं। उसने कहा कोई दिक्कत नहीं है, अभी गाड़ी 10 मिनट रुकेगी।

साथी

कृति को मैंने कहा कि तुम जाओ मैं इस तरफ इन्तेज़ार कर रहा हुँ, तो उसने आग्रह किया कि नहीं मुझे डर लगेगा तुम भी चलो मेरे साथ। मैं भी थोड़ा हिचकते हुए उसके साथ हो लिया। सड़क पार कर के कृति काफी दूर निकली जा रही थी। मैंने उसे रोकने की कोशिश की पर वो तब तक नहीं मानी जब तक रोशनी का एक एक कतरा उसकी आँखों से ओझल न हो गया। मैं भी वहीं कुछ दूरी पर मुँह फेर कर खड़ा था, पर हम इतनी दूर थे कि वो ढाबा और गैराज घर की आड़ से अब नहीं दिख रहे थे।

लगभग 5 मिनट बाद कृति वापस आई। हम वापस वहाँ पहुँचे तो बस वहाँ से जा चुकी थी। रात के 1:35 बज रहे थे, घोर सुनसान जगह। आदमी के नाम पर एक पानवाला, एक ट्रक वाला और उसका साथी, गैराज में एक दो आदमी होंगे और ढ़ाबे पर एक दो। मेरा तो जैसे पूरे शरीर से खून सुख चुका था। न हमारे पास फ़ोन था न पैसे, कृति लेकर नहीं आई थी और मैं सब चीजें बैग में डालकर आराम से सो रहा था। साथी का तो बुरा हाल था, वो रोये जा रही थी। मेरी भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। तभी मैंने जेब टटोला और शर्ट की जेब में बस का टिकट मिला। मुझे कुछ राहत मिली, उसमें बस वाले का नंबर था। मैंने पानवाले से मोबाइल माँगा तो उसने देने से इनकार कर दिया। उल्टे मुझ पर चिल्लाने लगा क्या लगती है ये लड़की तुम्हारी? खेतों में क्या करने गए थे? वो आदमी भी आ गया जो सामान चढ़ा रहा था। उसे देख के मैं समझ गया कि जिसे मैंने बस वाला समझा, वो यहीं का था और जान-बूझ कर बस वाले को हमारे बारे में कुछ नहीं बताया। पास ही चौकी पर बैठे दो लोग शराब पी रहे थे। उनकी नज़रें भी मुझे और कृति को घिनौने तरीके से घूर रही थीं।

साथी का स्वांग 

मैंने वहाँ मौजुद सभी लोगों से मदद माँगी पर ऐसा लग रहा था कि उनकी मंशा कुछ और ही थी। लोग धीरे धीरे हमें घेरते हुए हमारे पास आ रहे थे। कृति का तो बस ऐसा लग रहा था मानो मेरे अन्दर घुस जाएगी, बस रोए जा रही थी। मैं तब इतना परिपक्व भी नहीं था, मात्र 23 साल का था। मेरी आँखों के सामने अँधेरा छा रहा था। मुझे हम दोनों का हश्र साफ़ नज़र आ रहा था। मैं आँख बन्द कर पूरे मनोयोग से भगवान को याद करने लगा। मेरी आँखें बंद हो चुकी थी, मैंने कृति का हाथ ज़ोर से पकड़ रखा था। उसके बाद मेरे अन्दर एक शून्यता सी छा गई। कितनी देर तक मैं उस अवस्था में रहा, कुछ पता नहीं। मेरी आँखें एक तेज़ हॉर्न से खुलीं, और जब देखा तो वो बस बैक गियर में धीरे-धीरे पीछे आ रही थी। मैं कृति का हाथ पकड़े ज़ोर से उस ओर भागा। बस रुकी हम दोनों अन्दर आए, और हमारे शरीर में जान।

साथी की चाल 

बस का कन्डक्टर हम पर बेतहाशा चिल्लाए जा रहा था, पर उसकी ये चिल्लाहट में मुझे ईश्वर की आवाज़ सुनाई दे रही थी, उसके चेहरे में मैं साक्षात् इश्वर को देख रहा था। हम पुणे पहुँचे, कृति बहुत डरी हुई थी। कृति ने अपने घर में सारी बात बताई, पापा को सॉरी बोला। कृति के पापा ने मुझे कॉल किया, बात की और समझाया। हम दोनों ने अपने अपने एग्जाम दिए और सोमवार को दिन में ही वापस लौटे। मेरा तो कुछ नहीं हुआ पर कृति को CAT में अच्छे परसेंटाइल आए और उसको इंजीनियरिंग पास करते ही IIM उदयपुर, जो उसी साल स्थापित हुआ था, में दाखिला मिल गया। आज भी जब कृति से बात होती है तो उस दिन को याद कर हम सिहर उठते हैं। रूह काँपना किसे कहते हैं ये मैंने उस दिन महसुस किया था। कुछ बातें जो उस दिन सीखीं और आज तक अमल में ला रहा हुँ, उन्हें नीचे लिख रहा हुँ।

अगर सफ़र में साथ लड़की हो तो हमेशा दुगुनी सतर्कता बरतें।
बस से कहीं जा रहें हों और उतरना हो, तो ड्राइवर को ही बोलें।
ईश्वर शाश्वत सत्य हैं और हमारे मन की आवाज़ हर पल सुनते हैं।
अगर आप गलत नहीं हो तो ईश्वर सदैव आपकी रक्षा करेंगे।
माता-पिता की बात टालना आपको बहुत भारी पड़ सकता है।

साथी


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21 thoughts on “साथी: एक ऐसी सच्ची घटना जो आपकी रूह कंपा के रख देगी”

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