Truth Manthan

लखनऊ: Residency – A True Ghost Tale That Stands up (Hindi)

Spread the love

लखनऊ की रेज़ीडेंसी में, सन् 1857 ईसवी में, अंग्रेज़ों और भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानियों में भयानक युद्ध हुआ था। दोनों पक्षों के, सैकड़ों लोग इस जंग में जान से हाथ धो बैठे थे। आज, उसी भयावह घटना से सम्बन्धित भूतकथा भेज रहा हूं। अभी शाम का झुटपुटा है। जैसे-जैसे रात गहराती है, भूतों की कहानियों का मज़ा भी परवान चढ़ता है।

अगर आप लखनऊ में हैं और बात अगर भूत, प्रेत व आत्माओं की आ जाये, तो बेलीगारद यानी रेज़ीडेंसी का नाम ज़ुबां पर ज़रूर आ जायेगा। जी हां, ऐसा इसलिये क्योंकि एक समय था, जब शाम ढलते ही इस जगह पर लोग जाने तक से डरते थे। खास बात यह है कि बेलीगारद उस रास्ते पर स्थ‍ित है, जो पुराने लखनऊ को नये लखनऊ से कनेक्ट करता है। एक समय था, जब हज़रतगंज में रहने वाले लोग रात को पुराने लखनऊ की तरफ जाने से डरते थे, कारण था बेलीगारद।

रोंगटे खड़े करने वाली एक सच्ची कहानी

बात 1971 की है, जब लखनऊ विश्वविद्यालय के लाल बहादुर शास्त्री हॉस्टल में पढ़ने वाले तीन दोस्तों के बीच शर्त लगी कि किसमें इतनी हिम्मत है, जो रेज़ीडेंसी के अंदर रात बिता सके। यहां अकेली रात बिताना हर किसी के बस की बात नहीं, क्योंकि यहां वो क़ब्रिस्तान है, जिसमें 1857 की जंग में मारे गये अंग्रेज़ों को दफ़नाया गया था। सभी क़ब्रों पर एक-एक पत्थर लगा है और पत्थरों पर मरने वाले का नाम।

ख़ैर उन दोस्तों में से एक ने हिम्मत दिखाई और शर्त क़बूल कर ली। अगले दिन सफ़ेद रंग के कुर्ते पैजामे में तीनों दोस्त विश्वविद्यालय से निकले और नदवा कॉलेज और पक्का पुल के रास्ते से होते हुए रेज़ीडेंसी पहुंचे। रात के करीब 11 बजे थे, सन्नाटा छाया हुआ था। अधपक्की सड़क पर महज़ एक दो इक्के (पुराने जमाने में चलने वाले तांगे) ही नजर आ रहे थे।

ये भी पढ़ें :

Zehar – A Bad Story of Successful Farmers in Hindi

तीनों दोस्त बेलीगारद के अंदर पहुंचे। उन दिनों बेलीगारद के चारों ओर बाउंड्री वॉल टूटी हुई थी, कोई भी आसानी से अंदर जा सकता था। रात के बारह बजते ही तीन में से दो उठे और बोले, ठीक है, दोस्त हम चलते हैं, सुबह मिलेंगे। अपने दोस्त को सुनसान क़ब्रिस्तान में अकेला छोड़कर दोनों चले आये।

सभी के होश फ़ाख़्ता हो गये दूसरे दिन

दूसरे दिन सुबह उठते ही जब दोनों दोस्त रेज़ीडेंसी पहुंचे, तो वहां दोस्त नहीं, उसकी लाश मिली। पुलिस के डर से दोनों फ़रार हो गये। बाद में पुलिस ने रेज़ीडेंसी पहुंच कर युवक की लाश को अपने कब्ज़े में लिया और पोस्टमॉर्टम के बाद परिजनों के हवाले कर दी।

पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट में पता चला कि युवक की मौत हार्ट अटैक से हुई। हार्ट अटैक की वजह वो डर बताया गया, जिसका सामना भूत के साय में वह उस रात क़ब्रिस्तान में नहीं कर पाया।

रात को आज भी कोई नहीं जाता

लखनऊ में शहीद स्मारक के सामने एक टूटा हुआ पुराना किला है। इस किले को 1857 में अंग्रेजों ने नेस्तनाबूद कर दिया था। उस वक्त हजारों की संख्या में भारतीय मारे गये थे और सैंकड़ों अंग्रेज़ भी। मारे गये अंग्रेज़ों को इसी रेजीडेंसी में दफना दिया गया था। रात को इसके अंदर जाने से आज भी लोग डरते हैं।

रास्ते में मिलता था भूत

आस-पास रहने वाले लोग बताते हैं कि एक समय था, जब कोई इसके सामने से गुजरता था, उसे एक अजीब सा आदमी रास्ते में मिलता और रोक कर माचिस मांगता। अगर माचिस या बीड़ी दे दी, तो वह उसके पीछे पड़ जाता था। वो और कोई नहीं बल्क‍ि प्रेत हुआ करता था। जो कुछ दूर जाते ही ओझल हो जाता था।

सफेद पोशाक में प्रेत, मारो काटो की आवाज़ें

उसी दौर की बात है, जब रेजीडेंसी के पास से गुज़रने पर मारो-काटो की आवाजें सुनायी देती थीं। अक्सर वहां पेड़ों पर सफेद पोशाक में प्रेत लटकते हुए दिखाई देते थे। अक्सर बेलीगारद के पीछे लाशें पायी जाती थीं।

वक्त बदला पर डर नहीं

हालांकि अब समय बदल गया है। सरकार ने बेलीगारद को संरक्ष‍ित करते हुए चारों तरफ बाउंड्री वॉल ख‍िंचवा दी और लाइट की व्यवस्था कर दी। अब यह रोड रात भर चलती है। तमाम रौशनी और लाइट के बावजूद लोग इस क़ब्रिस्तान के अंदर जाने से आज भी डरते हैं।

ये भी पढ़ें :

Kisan- “जून की धूप” Hindi Kahani

 

क्या बताते हैं पुराने लोग

बेलीगारद के बारे में दो कहानियां लखनऊ के चौक इलाक़े में रहने वाले 89 वर्षीय फ़रहद अंसारी से बातचीत पर आधारित है। फ़रहद का बताया आपने जो पढ़ा उस पर शायद आपको विश्वास नहीं हुआ होगा, लेकिन फ़रहद अंसारी ने जो अंत में बताया, उसे पढ़ने के बाद आप इन घटनाओं पर यक़ीन ज़रूर कर लेंगे।

कौन था वो जो मांगता था बीड़ी

बेलीगारद के सामने सुनसान अंधेरी सड़क पर आधी रात को बीड़ी मांगने वाले और कोई नहीं स्थानीय लुटेरे हुआ करते थे। 80 के दशक में जब पुलिस ने अभ‍ियान चलाया तो दो दर्ज़न से ज़्यादा लोगों को पकड़ा, जो रात को लोगों को डरा कर उन्हें लूट लिया करते थे।

कैसे हुई थी 1971 में जब युवक की मौत

फ़रहद के अनुसार- दो दोस्त अपने जिगरी यार को क़ब्रिस्तान में घास पर बैठा अकेला छोड़कर चले गये तब, उसके कुछ ही देर बाद जब वो उठा, तो पाया कि किसी ने उसे पीछे से पकड़ा हुआ है। वो डर गया और हार्ट अटैक से मौत हो गई। सुबह पुलिस ने देखा जमीन में एक कील गड़ी हुई थी, जिसमें उसका कुर्ता फंसा हुआ था। यह कील किसी और ने नहीं उसी के दोस्तों ने जाने से पहले कुर्ते के ऊपर से ज़मीन में गाड़ी थी।

सफ़ेद कपड़ों में प्रेतों का राज़

बाक़ी, सफ़ेद कपड़ों में पेड़ पर लटके प्रेतों के बारे में फ़रहद बताते हैं कि पास में बलरामपुर अस्पताल है, जहां हड्डी रोग विभाग से जब कटने के बाद प्लास्टर निकलता था तो लोग मज़ा लूटने के लिये पेड़ों पर लटका दिया करते थे।

ये भी पढ़ें :

मां की बद्दुआओं ने कुछ ऐसा असर दिखाया कि सब कुछ सर्वनाश हो गया

 

लाशें पाये जाने का राज़

रही बात बेलीगारद में लाशें पाये जाने की, तो उसके ठीक पीछे बलरामपुर अस्पताल की मर्चरी है। वहां से निकलने वाली लावारिस लाशें अक्सर वहीं फेंक दी जाती थीं। बाद में पुलिस ने पहरा बढ़ा दिया, तो लाशें फेंकने का सिलसिला बंद हो गया।

सुबह में रेजीडेंसी

भूत प्रेत होता है या नहीं इसका जवाब हमारे पास नहीं है। लेकिन हां ऐसी तमाम कहानियों की वजह से बेलीगारद रात के सन्नाटों में हॉन्टेड प्लेस बन जाती है। लेकिन सुबह की सैर के लिये लखनऊ में इससे अच्छी कोई जगह नहीं।

Kumar Verma

256 B Azad Nagar Hardoi

Uttar Pradesh, India

यदि आपके पास हिंदी में कोई article, inspirational story या जानकारी है जो आप हमारे साथ शेयर करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ईमेल आई डी है: [email protected]. पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ प्रकाशित करेंगे. धन्यवाद!


Spread the love

84 thoughts on “लखनऊ: Residency – A True Ghost Tale That Stands up (Hindi)”

  1. Its like you read my mind! You seem to know so much about this, like you wrote the book in it or something.
    I think that you could do with a few pics to drive the
    message home a bit, but instead of that, this is fantastic blog.
    A great read. I will certainly be back.

  2. Pingback: dr oz keto diet
  3. “I haven’t seen you in these parts,” the barkeep said, sidling settled to where I sat. “Designation’s Bao.” He stated it exuberantly, as if low-down of his exploits were shared by way of settlers about many a verve in Aeternum.

    He waved to a unimpassioned tun upset us, and I returned his indication with a nod. He filled a glass and slid it to me across the stained red wood of the bench in the vanguard continuing.

    “As a betting fellow, I’d be ready to wager a fair bit of invent you’re in Ebonscale Reach in search more than the drink and sights,” he said, eyes glancing from the sword sheathed on my cool to the bend slung across my back.

    https://www.google.com.na/url?q=https://renewworld.ru/sistemnye-trebovaniya-new-world/

Leave a Comment