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चमार: भूली-बिसरी यादें, जब चमारों और ठाकुरों में आमना सामना हुआ

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चमार: मई 1971 की घटना है, एक चमार परिवार को गांव अदसंड़ चन्दौली के ही दबंग ठाकुर ने ही, दिन में उसके रिस्तेदार के सामने बहुत बूरी तरह पीटकर बेईज्जत कर दिया था। उस समय सवर्णों के एकाधिकार को चुनौती देते हुए पहली बार स्व० सुरेश सिंह यादव ग्राम प्रधान बने थे। करीब रात को 7-8 बजे पीड़ित परिवार उनसे मिलने आ गया।

रो-रो कर अपना दुख बयान करते हुए गांव छोड़कर जाने की बात कर रहा था। मैं भी वहीं मौजूद था। भाई साहब ने उसे समझाते हुए कहा था कि, “मान-सम्मान सबका एक समान और अपमान भरी जिंदगी से कहीं मौत अच्छी है।” पहली बार उनके मुंह से यह शब्द सुना था। काफी विचार-विमर्श के बाद अपमान का जबाव और आगे ऐसी घटनाएं न हो, इसके लिए एक प्लान बनी।

क्षत्रिय बहुल गांव, छोटी जातियों पर अत्याचार करना ही, अपनी शान और मर्यादा समझते थे। यादवों की कम संख्या होने के बावजूद भी, कभी उनसे आमने-सामने टकराने की हिम्मत नहीं होती थी। छोटे-मोटे टकराव होते रहते थे। हमें याद है कालेज जाते समय विद्यार्थी साइकिल में डंडा बांधकर जाते थे। मैं आज अनुभव कर रहा हूं कि उस समय, जिसकी लाठी उसकी भैंस का ही कानून ज्यादा चलता था।

हिंदू धर्म के अनुसार ही गांव के पूरब और दक्षिण कोने पर चमार बस्ती बसाई गई है। प्लान के मुताबिक, शाम के चार-पांच बजे के आस-पास हिम्मत बढ़ाने और और मौका आने पर मुसीबत में साथ देने के लिए कुछ यादव लाठी लेकर थोड़ी दूर पर खड़े हो गए थे।

चमार: भूली-बिसरी यादें, जब चमारों और ठाकुरों में आमना सामना हुआ

5-6 नौजवान चमार घर से खुले मैदान में बाहर आकर, नाम लेकर जोर जोर से चिल्लाते हुए, गालियां देना शुरू किया। अब क्या? जो भी सुना, उन ठाकुरों को करंट लगने लगी। सामंती शान और घमंड में चूर, गाली सुनते ही उनकी तरफ दौड़ पड़े और जो भी उनके नज़दीक गया, उनको मारते गिराते करीब 25-30 लोगों को जमीन पर सुला दिया। मरा तो कोई नहीं, लेकिन सबको अस्पताल जाना पड़ा था।

फिर वही कानूनी कार्रवाई, भागा कोई नहीं, शान से गिरफ्तारी, जमानत और फिर कोर्ट की तारीख का सिलसिला शुरू हुआ। दूसरे दिन सभी मुख्य समाचार पत्रों में हेडिंग के साथ समाचार झपा अदसंड़ के चमारों नें, ठाकुरों को दौड़ा-दौड़ा कर मारा।

आस-पास के चार-पांच जिलों में हड़कंप मच गया। चारों तरफ से सहयोग राशि भी पहुंचने लगी। तारीख के दिन सैकड़ों चमार कोर्ट के बाहर पहुंचते थे, हौसला बुलंद था। बैनर लगता था, आज तारीख है, अदसंड़ के चमारों ने, ठाकुरों को दौड़ा-दौड़ा कर मारा। ठाकुरों को तारीख पर जाने में अपमान महसूस होता था और उनके मान-सम्मान पर उस समय बहुत ठेस पहुंची थी। अंत में हारकर समझौता करना पड़ा था और किसी को कोई सजा नहीं हुई।

उसके बाद आज तक आस-पास के क्षेत्रों में भी कोई बड़ी चमारों के साथ अपमान की घटना नहीं घटी और अमन चैन बना हुआ है। फिर से दिनांक 16-05-2020 को करीब 50 साल बाद, वैसे ही घटना की पुनरावृत्ति हुईं थीं। लेकिन पृष्ठभूमि थोड़ी अलग थी। इस बार आपस में भाजपाइयों में ही पिछड़ी जाति के प्रधान और उनके पिछड़ी जाति के साथियों के साथ हुई थी।

यादव और चमार इस संघर्ष से दूर रहे। संघर्ष का परिणाम यह हुआ कि, उस समय कर्णी सेना पूर्वांचल के अध्यक्ष भुपेंद्र प्रताप सिंह को ठाकुरों की सुरक्षा के लिए कन्दवा पोलिश थाने पर जून 2020 को धरना देना पड़ा था। फिलहाल गांव में अमन चैन बना हुआ है। प्रकृति का भी नियम है, जहां क्रिया और प्रतिक्रिया में संतुलन बना रहता है, वहां अमन-चैन भी कायम रहता है।

लेख- शूद्र शिवशंकर सिंह यादव
मो०- W- 9869075576
W- 7756816035

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109 thoughts on “चमार: भूली-बिसरी यादें, जब चमारों और ठाकुरों में आमना सामना हुआ”

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