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आंटी: हम उन्हें आज भी नहीं भूल पाए भाग-2

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आंटी: एक महीने की कहानी आपने पिछले भाग में पढ़ी। अब मैं आप लोगों को आगे की कहानी बताता हूं। मैंने जिस व्यक्ति को बचाया था वह गांव के ही एक पंडित जी थे। उस घटना के बाद उनका बेटा अक्सर हम लोगों के पास आता रहता था। उसकी उम्र भी लगभग 10 वर्ष के बीच थी। मेरे प्रति उस लड़के का और उसके परिवार वालों का प्रेम बहुत ही ज्यादा बढ़ गया था। हालांकि मेरे हिसाब से मैंने ऐसा कुछ नहीं किया था किंतु उन लोगों का कहना था। अगर भैया जी आप ना होते तो शायद मेरे पिताजी ना बच पाते।

उस घटना के बाद हम लोगों के हौसलों में काफी उड़ान लग गई थी। अब हम लोग अक्सर लोगों के किसी न किसी तरह से मदद करते रहते थे। यह सब देख कर लोगों के प्रति हम लोग एकदम से हीरो बन चुके थे।

एक दिन की बात है शाम के लगभग 7:00 बज रहे थे मेरा दोस्त संतोष अभी तक पंचायत घर में लौट कर नहीं आया था। मुझे चिंता सी हुई और मैं उसे खोजने निकल पड़ा। मैंने थोड़ी दूर चलने के बाद देखा कि वह दुकान वाली आंटी जी के घर में बैठा था। मैंने बाहर से उसे आवाज लगाई और बुला लिया। इसके बाद हम लोगों ने मिलकर एक नियम बनाया अब कोई 7:00 बजे के बाद पंचायत भवन के बाहर नहीं जाएगा। लेकिन सबसे ज्यादा नियम को मैंने ही बनाया था और मेरे द्वारा ही वह नियम टूटने वाला था।

आंटी की अब भी मदद याद आती

एक दिन मैं रास्ते से जा रहा था, तभी एक लगभग 10 साल के बच्चे ने मुझे बुलाया वह लड़का आंटी जी का सबसे छोटा बच्चा था। उसने घर के अंदर चलने को कहा लेकिन मैंने मना कर दिया। किंतु वह नहीं माना और जिद करने लगा जिसके बाद मुझे उसकी बात माननी पड़ी। और मैं उसके घर चला गया आंटी जी के घर में उनके दो बेटे और 3 बेटियां थी। एक बेटी की शादी हो गई थी।

मैं जब घर के अंदर गया तो उन लोगों ने मुझे चाय पिलाई और कई तरह के बिस्किट और नमकीन सामने भरोसे। मुझे काफी शर्म भी आ रही थी क्योंकि मेरे आस-पास परिवार के सभी लोग बैठे थे। और लगातार अपने-अपने प्रश्न पूछे जा रहे थे। हालांकि मैं कुछ प्रश्नों के जवाब दे रहा था और किसी किसी-किसी प्रश्न का उत्तर नहीं भी दे रहा था। मैं लगभग 10 मिनट तक रुका और उसके बाद वहां से पंचायत भवन लौट आया।

उस दिन के बाद उस परिवार से मेरा इतना ज्यादा लगाव हो गया कि जब भी मैं उनके घर नहीं जाता तो वह उन का छोटा लड़का मुझे बुलाने आ जाता था और कभी कभी उनकी छोटी बेटी भी मुझे बुलाने आ जाती थी। मैं जाता था और वह सभी मिलकर मेरे साथ ही खाना इत्यादि खाते थे।


एक दिन की बात है। उनकी बेटी ने मुझसे कहा कि भैया जी चलो छत पर घूमते चलते हैं। मैं उसके साथ ऊपर चला गया। ऊपर जाने के बाद उसने मुझे लगभग 4 पेज का प्रेम पत्र थमा दिया। मैंने उससे पूछा यह क्या है, तो उसने कहा इसे खोल कर पढ़ लो। मैंने उसे पढ़ा तो मैं काफी हैरान हो गया। मैंने उसे समझाया की यह प्रेम पत्र किसी और के लिए रख लो। मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि जब तुम सब लोग मुझसे भाई जैसा प्रेम करते हो और उसके बाद इस तरह की हरकतें करती हो।

मैंने उसे डाटा और कहा भविष्य में इस तरह की कोई गलती मत करना। उस दिन तो वह चली गई किंतु इसके बाद अगले दिन उसने अपने हाथ को सिगरेट से जला लिया। मैंने अगले दिन जब देखा तो उसके हाथ में काफी बड़ा घाव था। मैंने जब पूछा तो उसने बताया कि खाना बना बनाते समय मैं जल गई थी। लेकिन मैं सारी बात समझ चुका था।

इसके बावजूद भी मैंने उस लड़की की कोई भी बात नहीं मानी और उनके घर आता जाता रहा। मैं उनकी मां जी को माताजी के समान समझता था और वह तीनों लड़कियां मेरी बहन जैसी थीं। अक्सर हम लोग छत पर जाते आपस में हंसते खेलते घूमते मगर कभी भी किसी के अंदर कोई पाप नहीं पैदा हुआ। उनके घर वालों को भी हम पर बहुत भरोसा था और मैं पूरी तरह से उस भरोसे को कायम रखना चाहता था, और मैंने उसे कायम भी रखा है।

एक दिन की बात है मैं किसी काम से अपनी यूनिवर्सिटी गया था। मुझे शाम तक वापस आना था। इसलिए मैं सुबह जल्दी उठा और चला गया। मेरे जाने के बाद उनकी बड़ी बेटी जिसका नाम अंजना था। उसने पूरे दिन खाना नहीं खाया। जब मैं शाम को वापस लौटा तो मेरे साथियों ने मुझे पूरी घटना बताई। मैं तुरंत आंटी जी के घर गया और अंजना से खाना न खाने के बारे में पूछा। अक्सर हम लोग साथ में ही खाना खाते थे और सभी एक दूसरे को अपने हाथों से खिलाते थे। मगर मैं यह नहीं सोचता था कि मेरे कहीं चले जाने पर कोई भी भूखा रहेगा। मैंने अंजना को समझाया और खाना खिलाया।

इस घटना के बाद आंटी जी के घर से इतना लगाव हो गया कि मैं अपना अधिकतर समय उन्हीं के घर में बिताता था। तीन बहने और दो भाई उन्हीं को अपना भाई समझने लगा था। गांव के लोग भी हम लोगों को बहुत ही ज्यादा प्यार करते थे। जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं, सब्जियां, फल. दूध आदि गांव के लोग हमें मुफ्त में ही दे जाते थे और हम लोग सिर्फ उनके बच्चों को पढ़ाते थे। दो महीने के अंदर हम सभी लोगों ने मिलकर बच्चों के अंदर इतना बदलाव कर दिया इतना संस्कारी बना दिया कि उनके परिवार के माता या पिता जब भी आते हैं हम लोगों की जमकर तारीफ करते थे। समय यूं ही गुजरता रहा और हम लोग बच्चों के साथ और आंटी जी के परिवार के साथ-साथ गांव के अन्य कई परिवारों के साथ अपना समय काटते रहे।

उसी गांव की एक दिलचस्प घटना है जिसके बारे में मैं बताना चाहूंगा। हमारे पंचायत भवन के पास ही एक लोग का मकान था। जिन की लड़की बहुत ही सुंदर थी। वह अक्सर छत पर आती थी और हम लोगों को देखती रहती थी। हम लोग भी उसे देख कर काफी खुश होते थे। उस लड़की का नाम सोनिया था। सोनिया के कई बाग़ थे और उन भागों में नींबू, करौंदा, आम जैसे फल होते थे। एक दिन मेरे अंदर का प्यार जाग उठा और मैंने एक छोटी सी पर्ची बनाई एवं उस लड़की की छत पर फेंक दी। जिसमें साफ-साफ लिखा था कि आपको पसंद करना है तो हमने से किसी एक को पसंद करो। हम सभी को आप पसंद करती हैं या नहीं करती हैं। यह हम लोगों को पता भी नहीं है। उस पर्ची के जवाब के लिए हमें कई दिन का इंतजार करना पड़ा। आपको बता दें हमारा मुख्य कार्य जितने भी लोग थे सभी के रजिस्टरों को अपडेट करना था और बाकी लोग मिलकर के खाना इत्यादि बनाते थे। हालांकि मैं भी कभी-कभी खाना बनाने में मदद करता था।

एक दिन की बात है सभी लोग बाहर गए हुए थे। मैं पंचायत भवन के अंदर मैदान में अपनी मेज और कुर्सी डालकर सभी के रजिस्टर अपडेट कर रहा था। एक घंटे तक मैं सभी के रजिस्टर अपडेट करता रहा और तभी मैंने देखा कि मेरे सभी दोस्तों ने पंचायत भवन के अंदर प्रवेश किया। इत्तेफाक से जैसे ही हमारे दोस्तों ने पंचायत घर में प्रवेश किया उसी समय सोनिया ने नींबू में लपेट कर एक पत्र पंचायत भवन में फेंक दिया। हालांकि मैंने उसे पत्र फेंकते हुए नहीं देखा। किंतु मेरे दोस्तों ने उसे पत्र फेंकते हुए देख लिया था। और आकर उसे उठाया। पत्र उठाते ही जैसे उन्होंने पढ़ा उन चारों लोगों की हमारे प्रति भावना ही बदल गई। पत्र में साफ-साफ लिखा था कि मैं सिर्फ आपको पसंद करती हूं। इतना पढ़ने के बाद हमारे दोस्त हमसे काफी गुस्सा भी हुए और कहा कि कम से कम समय तो कटता था। लेकिन यार तुमने वह भी छीन लिया। इसके बाद हम और सोनिया अक्सर मिलने लगे।

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एक दिन की बहुत ही दिलचस्प घटना बताना चाहूंगा। मेरा दोस्त सुबह उठकर अपनी दाढ़ी बनाने लगा था। उस समय लगभग सुबह के 4:00 बजे थे। मैंने उससे पूछा इस समय किस लिए दाढ़ी बना रहे हो। क्या कहीं जाना है? उसने कहा नहीं मुझे दूध लेने जाना है। मैंने कहा दूध लेने के लिए इतनी जल्दी दाढ़ी बनाने की जरूरत क्या है। उसने क्या मेरी मर्जी। खैर मैंने उससे कुछ नहीं कहा और वह दूध लेने चला गया। अगले दिन मैं भी सुबह 4:00 बजे उठा और अपनी दाढ़ी बनाने लगा। उसने मुझसे पूछा कि तुम्हें कहीं जाना है क्या ? मैंने कहा नहीं दूध लेने जाना है। वह गुस्से से आगबबूला हो गया और कहने लगा कि तुम मुझे ही परेशान क्यों करते रहते हो। मैंने कहा इसमें परेशानी की क्या बात है। दूध चारों लोगों का आता है। इसलिए इमानदारी से चारों लोगों को दूध लेने जाना चाहिए। उसने मुझे काफी रोका लेकिन मैं नहीं माना।

मैं जब दूध लेने गया तो दूध वाले ने मुझसे कहा कि आप बैठ जाइए मैं दूध निकालता हूं। मैं बैठ गया तभी अचानक मेरी नजर एक लड़की पर पड़ी जो कुछ बच्चों को सुबह-सुबह ट्यूशन पढ़ा रही थी। उसी लड़की के खातिर हमारा दोस्त रोजाना जल्दी दूध लेने जाता था और वहां बैठकर उसे देखता रहता था। हालांकि मेरे दोस्त की किस्मत ने साथ नहीं दिया और वह लड़की दो-चार दिन बाद ही किसी लड़के के साथ भाग गई।

हमारे आने के जब 4 दिन शेष बचे थे। उस समय मुझे भी एक लड़की से प्रेम हो गया लेकिन वक्त बहुत कम था इसलिए हमारा प्रेम आगे नहीं बढ़ सका। आखिर वह दिन भी आ गया जब हमारे विश्वविद्यालय की बस आ चुकी थी। जैसे ही लोगों ने आकर हमें बताया। हम लोगों के जैसे आधे प्राण ही निकल गए। हम लोगों को उन बच्चों और वहां के लोगों में इतना अच्छा लग रहा था जिसकी आज भी कल्पना नहीं की जा सकती है। उस गांव के लोग इतने अच्छे होंगे यह मुझे पहली बार पता चला था कि गांव में ऐसे भी लोग रहते हैं। जिनके पास रहने के बाद कहीं जाने का मन ही नहीं होता। फिलहाल हम लोगों ने जैसे ही अपने बच्चों को बताया तो उनकी आंखों से आंसुओं की धाराएं बहने लगी। बच्चे रो रहे थे किंतु उनको रोते हुए हम लोग भी खुद को नहीं रोक पाए और हम लोगों की आंखों से भी आंसुओं ने बहना शुरू कर दिया।

हम लोग आंसुओं को रोंकने की काफी कोशिश कर रहे थे मगर सारी कोशिशें नाकाम हो रही थी। पूरे गांव में मेला जैसा लगा था। पूरा गांव अपनी आंखें नम किए हुए था। गांव का कोई भी व्यक्ति यह नहीं चाहता था कि यह बच्चे हमारे गांव से कभी जाएं। लेकिन ऐसा असंभव था। हम लोग आंटी जी के घर गए उनके परिवार वालों से मिले तो इस तरह के हालात हो गए की पूरे परिवार के सदस्य हम लोगों से लिपट लिपट कर रोने लगे। हम लोगों के समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर क्या किया जाए लेकिन आना तो था ही। किसी तरह हम लोगों ने अपने दिल को धीरज बंधाया और गांव वालों की भारी संख्या के साथ सड़क की तरफ बढ़ चले। हम लोग देख रहे थे हमारे साथ भीड़ बहुत ज्यादा थी किंतु इसके अलावा लोग अपनी छतों से भी हम लोगों को हाथ से टाटा का इशारा करके विदा कर रहे थे। किसी तरह हम लोग बस तक आए और हमारी बस हम लोगों को हमारे विश्वविद्यालय ले आई। हम लोगों के विश्वविद्यालय तक आंसू नहीं बंद हुए।

इस घटना के कुछ दिन बाद बच्चों ने फोन कर चिड़ियाघर देखने की इच्छा की तो हम लोगों ने सभी बच्चों को बुलाया और चिड़ियाघर दिखाया।

जरूरी नहीं कि रिश्ते खून के ही हो तभी वह आगे बढ़ते हैं। प्रेम के रिश्ते भी अटूट होते हैं। इसके बाद भी मैं किसी पार्टी और शादी में आंटी के घर जाता रहा और जिस तरह से होता उनके परिवार वालों को उपहार भी देता। आंटी जी के परिवार के सभी सदस्य भी हमारे प्रोग्रामों में आते और बढ़-चढ़कर भाग लेते।

आंटी जी और अंकल जी की अभी कोई बहुत ज्यादा उम्र नहीं हुई थी किंतु एक दिन मुझे पता चला कि एक दुर्घटना में आंटी जी की मौत हो गई। हालांकि मैं कुछ कारणवश नहीं जा पाया और उसके थोड़े दिन बाद ही अंकल जी की भी हार्ट अटैक से मौत हो गई। उस समय भी मैं दुर्भाग्यवश नहीं पहुंच पाया। हालांकि मेरी कुछ ऐसी मजबूरियां थी जिनके चलते मैं दोनों के अंतिम संस्कार में नहीं पहुंच पाया जिसके लिए मैं सारी उम्र अपने को शायद माफ नहीं कर पाऊंगा।

आंटी और अंकल जी के इस दुनिया के जाने के बाद रिश्ते तो नहीं टूटे लेकिन बहुत कमजोर हो गए। अब हम लोगों के पास बहुत कम फोन आते हैं। क्योंकि बच्चियां भी बहुत बड़ी-बड़ी हो गई हैं और उनकी शादियां भी हो गई हैं। इसलिए हम लोग उनसे बात भी नहीं करना चाहते क्योंकि हम नहीं चाहते कि उनकी खुशियों भरे जीवन में किसी तरह का दुख आये। आज हम सभी लोग सरकारी नौकरी कर रहे हैं और खुश हैं, लेकिन अक्सर जब बात होती हैं तो सभी यही कहते हैं हम उन्हें आज भी नहीं भूल पाए।

लेखक -आर .के . गौतम 


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52 thoughts on “आंटी: हम उन्हें आज भी नहीं भूल पाए भाग-2”

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